उज्जैन। उज्जैन के देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद’ के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर संघ प्रमुख ने युवाओं को संबोधित करते हुए धर्म का वास्तविक अर्थ (Ujjain RSS Chief Visit) समझाया और जीवन में इसके नैतिक एवं व्यावहारिक महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।
रिलीजन का अर्थ धर्म नहीं होता
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि ‘रिलीजन’ का अर्थ ‘धर्म’ कदापि नहीं होता। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा और शब्दकोश में धर्म के लिए कोई सटीक पर्यायवाची शब्द मौजूद ही नहीं है।’रिलीजन’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘रिलिजियो’ से हुई है, जो किसी को बांधने का संकेत देता है; जबकि भारतीय संस्कृति में धर्म किसी को बांधता नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति इसके मूल भाव को मिटाना चाहती है, इसीलिए इसे रिलीजन का नाम देती है।
धर्म केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, युवाओं को दिखाता है सही दिशा
कार्यक्रम के दौरान डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों या सेवानिवृत्त लोगों के लिए नहीं है, बल्कि यह युवाओं को जीवन में सही दिशा दिखाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने उल्लेख किया कि महाभारत के अंतिम पांच श्लोक पूरी महाभारत का वास्तविक सार हैं। जीवन में धर्म के मार्ग पर चलकर ही काम, अर्थ और मोक्ष की सिद्धि होती है। धर्म को बोझ मानकर रोते-रोते चलने के बजाय यदि इसे समझकर जीवन में अपनाया जाए, तो (Ujjain RSS Chief Visit) जीवन सार्थक बन जाता है। किसी भी जीव को पीड़ा न देना ही सबसे बड़ा धर्म है और पीड़ा पहुंचाना महापाप है।
