सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) से निवेशकों को दो तरह से कमाई होती है—पहला, सालाना (SGB Tax Rules) मिलने वाला ब्याज और दूसरा, बॉन्ड की कीमत बढ़ने पर मिलने वाला कैपिटल गेन। इन दोनों पर टैक्स के नियम पूरी तरह अलग हैं:
-
-
सालाना मिलने वाले ब्याज पर टैक्स: SGB पर 2.5 फीसदी प्रति वर्ष ब्याज मिलता है, जो सीधे बैंक खाते में जमा होता है। यह पूरी तरह टैक्सेबल है और इसे ITR में ‘Income from Other Sources’ (अन्य स्रोतों से आय) के तहत दिखाना अनिवार्य है। आरबीआई इस पर TDS नहीं काटता, इसलिए कई निवेशक इसे रिटर्न में दिखाना भूल जाते हैं, जो बाद में इनकम टैक्स नोटिस का कारण बनता है।
-
-
-
मैच्योरिटी और कैपिटल गेन्स: यदि आप SGB को 8 साल की मैच्योरिटी तक अपने पास रखते हैं, तो रिडेम्पशन के समय मिलने वाला पूरा मुनाफा 100% टैक्स-फ्री होता है। 5 साल बाद आरबीआई के साथ प्री-मैच्योर रिडेम्पशन करने पर भी टैक्स छूट मिलती है। हालांकि, यदि आप इसे 8 साल से पहले स्टॉक एक्सचेंज पर बेचते हैं, तो उस पर शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा।
-
ITR में जानकारी देने का सही तरीका
SGB से जुड़े ट्रांजैक्शन की जानकारी ITR-2, ITR-3 या ITR-4 में संबंधित शेड्यूल में दी जानी चाहिए। सालाना 2.5 फीसदी ब्याज को ‘Schedule OS’ में दिखाएं। कैपिटल गेन्स की रिपोर्टिंग बॉन्ड को बेचने या भुनाने के तरीके पर निर्भर करती है। मैच्योरिटी पर रिडीम करने वाले ओरिजिनल सब्सक्राइबर्स को कैपिटल गेन टैक्स से छूट है, लेकिन (SGB Tax Rules) फिर भी इसे ‘Exempt Income’ शेड्यूल में दिखाना बेहतर है।
ITR फाइल करते समय भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां
-
-
AIS और TIS को क्रॉस-चेक न करना: रिटर्न भरने से पहले अपना Annual Information Statement (AIS) जरूर चेक करें। आरबीआई द्वारा दिया गया ब्याज इसमें दर्ज होता है।
-
-
-
एक्सचेंज पर बेचे गए बॉन्ड को छुपाना: यदि आपने शेयर बाजार के जरिए मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेचे हैं, तो उसे ‘Capital Gains’ शेड्यूल के तहत जरूर दर्ज करें।
-
-
-
टैक्स-फ्री मैच्योरिटी को न दिखाना: भले ही 8 साल बाद मिला पैसा टैक्स-फ्री है, फिर भी इसे ‘Exempt Income’ वाले शेड्यूल में रिपोर्ट करना चाहिए ताकि आपकी संपत्ति का सही ब्योरा विभाग के पास रहे।
-


