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    Home » आस्था या संविधान? सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच के सामने तीखी बहस, ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ पर उठे बड़े सवाल

    आस्था या संविधान? सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच के सामने तीखी बहस, ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ पर उठे बड़े सवाल

    April 17, 2026 देश 2 Mins Read
    faith or constitution
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    सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई के दौरान, आस्था, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस हुई. दरअसल, केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम (faith or constitution) कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई जारी रही.

    इससे पहले 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है. साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता. पांचवे दिन आत्मार्थम ट्रस्ट की ओर से पेश होते हुए, वकील एम.आर. वेंकटेश ने ‘संप्रदाय’ शब्द की व्याख्या को चुनौती दी. उन्होंने तर्क दिया कि यह शब्द विदेशी मूल का है और भारतीय संदर्भ में इसकी अपनी सीमाएं हैं.

    इसे भी पढ़ें – महिला आरक्षण के मुद्दे पर NDA का बड़ा ऐलान, विपक्ष के खिलाफ कल देशभर में होगा जोरदार प्रदर्शन

    faith or constitution – उन्होंने दलील दी कि गैर-सांप्रदायिक मंदिरों के अधिकारों को भी समान सुरक्षा दी जानी चाहिए. वेंकटेश ने आगे कहा कि कई महिलाएं स्वेच्छा से मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश करने से बचती हैं. इस प्रथा को परंपरा और व्यक्तिगत आस्था के दायरे में समझा जाना चाहिए.

    सभी धर्मों के अधिकारों को ध्यान में रखे सुप्रीम कोर्ट

    इसके विपरीत, वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कोर्ट के सामने एक व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि कोर्ट को एक संतुलित फैसला देना चाहिए जो सभी धर्मों के अधिकारों को ध्यान में रखे. धवन ने यह भी कहा कि आस्था समय के साथ विकसित होती है, और ऐसा विकास केवल कानूनी उपायों से नहीं लाया जा सकता. उनके अनुसार, असहमति और विभाजन से भरे समाज में, कोर्ट को एक सामंजस्यपूर्ण व्याख्या अपनानी चाहिए.

     

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