सनातन हिंदू धर्म में वर्षभर मनाए जाने वाले पर्व और उपवास केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे अत्यंत गूढ़ धार्मिक मान्यताएं, आध्यात्मिक सिद्धांत और वैज्ञानिक पंचांग गणनाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसी ही एक अद्वितीय परंपरा पितृपक्ष और शारदीय नवरात्रि के संक्रमण काल में देखने को मिलती है। एक तरफ जहां पितृपक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों की तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, वहीं इसके समाप्त होते ही अगले दिन से जगतजननी मां (navratri and pitru paksha) दुर्गा की आराधना का महापर्व शारदीय नवरात्रि प्रारंभ हो जाता है।

navratri and pitru paksha – वर्ष 2026 में पितृपक्ष की मुख्य श्राद्ध अवधि 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक निर्धारित है, जिसके तुरंत बाद 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक शारदीय नवरात्रि का उत्सव मनाया जाएगा। एक ओर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान का काल पूर्ण होता है और दूसरी ओर शक्ति की उपासना का नवदिवसीय अनुष्ठान शुरू हो जाता है।

 पितृपक्ष के तुरंत बाद क्यों आती है नवरात्रि? 
    • कृष्ण पक्ष का महत्व: वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पूरी तरह से पितरों के निमित्त समर्पित होता है। इसे ‘महालय’ या ‘पितृपक्ष’ कहा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी ‘सर्वपितृ अमावस्या’ के साथ पितृपक्ष का विधिवत समापन होता है।

    • शुक्ल पक्ष की शुरुआत: अमावस्या के ठीक अगले दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होता है। पंचांगीय व्यवस्था के तहत कृष्ण पक्ष के बाद स्वतः ही शुक्ल पक्ष आता है, जो अंधकार से प्रकाश और पितृ तर्पण से देवी उपासना के संक्रमण को दर्शाता है।

 सृष्टि चक्र और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन
    • सकारात्मकता का संचार: सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों की तृप्ति और विदाई के बाद संपूर्ण वातावरण में एक नई ऊर्जा, सात्विकता और उल्लास का संचार होता है।

    • आदिशक्ति का स्वागत: इसी निर्मल और सकारात्मक वातावरण में आदिशक्ति मां दुर्गा का आह्वान घटस्थापना के जरिए किया जाता है। इसलिए यह क्रम सृष्टि चक्र के संतुलन और नई शुरुआत का सुंदर प्रतीक माना जाता है।

       

 

 

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