हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यंत पावन और विशेष महत्व माना गया है, जो इस वर्ष 26 सितंबर से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर तक रहने वाला है। इस समयावधि के दौरान श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों की (your own pind daan while alive) आत्मा की शांति और तृप्ति के निमित्त श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
your own pind daan while alive – लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि किसी व्यक्ति ने जीवित रहते हुए ही स्वयं का पिंडदान कर लिया हो? आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार के गया धाम में स्थित एक पावन मंदिर में ठीक ऐसा ही विधान सदियों से चला आ रहा है। यहां श्रद्धालु अपने जीवनकाल में ही स्वयं का पिंडदान करते हैं। इस मंदिर में यह परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है और पितृ पक्ष के दौरान देश-विदेश से लोग यहां पहुंचकर ‘आत्मश्राद्ध’ का कर्मकांड पूरा करते हैं।
पिंडदान और मोक्ष का महत्व
सनातन धर्म में पिंडदान अत्यंत पवित्र संस्कार और अनुष्ठान है, जो मुख्य रूप से पितरों की आत्मा की शांति, परितृप्ति और मोक्ष प्राप्ति की कामना से किया जाता है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से पितृ पक्ष के पावन दिनों में गया, प्रयागराज और हरिद्वार जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर संपन्न किया जाता है। इन्हीं में से एक बिहार के गया जिले के भस्मकूट पर्वत पर स्थित जनार्दन मंदिर है। यह एक ऐसा अनोखा और अलौकिक धार्मिक स्थल है, जहां लोग जीवित रहते हुए भी विधि-विधान के साथ अपना पिंडदान और आत्मश्राद्ध संपन्न करते हैं।
क्यों किया जाता है जीते-जी पिंडदान?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति यहां स्वयं अपना पिंडदान कर देता है, उसकी आत्मा को देहत्याग के बाद सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है और मृत्यु के उपरांत उसके परिजनों को यह अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। आमतौर पर जिन व्यक्तियों की कोई संतान, वारिस या वंशज नहीं होता, अथवा जिन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया है, वे विशेष रूप से यहां आकर जीवनकाल में ही अपना पिंडदान करते हैं।
