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    Home » क्या है Worship Act 1991? क्यों उठ रही इसे खत्म करने की मांग?

    क्या है Worship Act 1991? क्यों उठ रही इसे खत्म करने की मांग?

    February 6, 2024 उत्तर प्रदेश 2 Mins Read
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    स वक्त देश में सबसे ज्यादा चर्चा ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ यानी पूजा स्थल कानून की हो रही है। लेकिन क्या है प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट और क्या कहते हैं इसके प्रावधान, आइए जानें 7 रूल 11 और प्लेसेस ऑफ Worship Act 1991 क्या है?

    ऑर्डर 7 रूल 11 क्या है?

    आम भाषा में अगर ऑर्डर 7 रूल नंबर 11 को समझा जाए तो इसके तहत कोर्ट किसी केस में तथ्यों की मेरिट पर विचार करने के बजाए सबसे पहले ये तय करता है कि क्या याचिका सुनवाई करने लायक है या नहीं। जो राहत की मांग याचिकाकर्ता की ओर से मांगी जा रही है, क्या उसे कोर्ट द्वारा दिया भी जा सकता है या नहीं। अगर कोर्ट को ये लगता है कि याचिका में मांगी गई राहत दी ही नहीं जा सकती तो कोर्ट केस की मेरिट पर जाने के बजाए बिना ट्रायल के ही याचिककर्ता को सुनने से इनकार कर सकता है।

    इसे भी पढ़ें – अब लंका नहीं…अयोध्या बन रही है सोने की, जमीनों के रेट…

    रूल 7 के तहत कई वजह है, जिनके आधार पर कोर्ट शुरुआत में ही याचिका को खारिज कर देता है। मसलन अगर याचिकाकर्ता ने वाद को दाखिल करने की वजह स्पष्ट नहीं की हो या फिर उसने दावे का उचित मूल्यांकन न किया हो या उसके मुताबिक कोर्ट फीस न चुकाई गई हो। इसके अलावा जो एक महत्वपूर्ण आधार है वो है कि कोई कानून उस मुकदमे को दायर करने से रोकता हो।

    इसे भी पढ़ें – योगी सरकार का खुला पिटारा, UP Budget में किसानों, महिलाओं के लिए ये रहा खास

    क्या कहता है प्लेस ऑफ Worship Act 1991

    1991 में लागू किया गया प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यदि कोई इस एक्ट का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। यह कानून तत्कालीन पीवी नरसिंह राव सरकार 1991 में लेकर आई थी। यह कानून तब आया जब बाबरी मस्जिद और अयोध्या का मुद्दा बेहद गर्म था।

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