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    Home » UCC से इन जनजातियों को क्यों रखा गया बाहर, सरकार ने दिया ये तर्क

    UCC से इन जनजातियों को क्यों रखा गया बाहर, सरकार ने दिया ये तर्क

    February 17, 2024 उत्तराखण्ड 4 Mins Read
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    उत्तराखंड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बन गया। पिछले ही दिनों विधानसभा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने UCC को सदन के पटल पर रखा और पास करवा कर संवैधानिक रूप दे दिया। हालांकि, राष्ट्रपति का मुहर लगना अभी बांकी है। जैसे ही राष्ट्रपति का मुहर इस कानून पर लग जाएगा, उसी दिन यह कानून का रूप ले लेगा। इस विधेयक पर देशभर में खूब चर्चा हुई।

    कुछ मुस्लिम संगठनों ने किया था विरोध

    कुछ मुस्लिम संगठनों ने UCC का विरोध भी किया। लेकिन सरकार ने हर मंच पर यह स्पष्ट किया कि ये कानून किसी के सांस्कृतिक पहचान को धूमिल नहीं करेगा। लेकिन क्या आप जानते है कि उत्तराखंड में जो UCC लागू हुआ, वो एक समुदाय पर लागू नहीं होगा? जी हाँ, उत्तराखंड में रहने वाले कुछ जनजातीय समूहों को इस कानून का पालन नहीं करना होगा।

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    वो जनजातीय समूह हैं: भोटिया, जौनसारी, बुक्शा, थारू और राजी। इन पांचों समूहों को 1967 में अनुसूचित जनजाति माना गया। सरकार ने इसके पीछे तर्क यह दिया कि अगर उन्हें भी यूसीसी में शामिल कर लिया जाए तो जनजातीय परंपराओं की खासियत खत्म होने लगेगी। एक बात यहां जानना जरूरी है कि इस जनजातियों की उत्तराखंड में कुल 3 प्रतिशत आबादी और अधिकत्तर शहरों से दूर गांव में रहते हैं।

    इन जनजातियों में एक से अधिक शादियां करने की लंबी परंपरा है। साथ ही इनके समाज को महिला प्रधान माना जाता है। यानी कि मुश्किल काम महिलाओं के जिम्मे होता है। जहां भारत के समाजव्यवस्था आमतौर पर पुरुष प्रधान है। आमतौर पर बहुविवाह का नाम सुनते ही पुरुषों की कई महिलाओं के साथ शादी करने की तस्वीर सामने आती है।

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    कुछ जनजातियों में महिला के बहुविवाह का चलन

    लेकिन जौनसारी जनजाति में महिलाओं का बहुविवाह करने का चलन है। जौनसारी खुद को पांडवों के वंशज मानते हैं। महिलाएं आमतौर पर एक घर में ही 2 या कई भाइयों की पत्नियों के रोल में रहती थीं। इसके अलावा इस शादी से हुई संतानों को बड़े भाई की संतान या कॉमन माना जाता है। वहीं थारू जनजातियों के महिलाओं के साथ पुरुषों को भी बहुविवाह की अनुमति है।

    इस जनजाति के महिला या पुरूष, दोनों ही अपने मनपसंद जीवनसाथी को चुन सकते हैं। इन 5 जनजातियों में से एक में लिव इन रिलेशनशिप का भी चलन है। भोटिया जनजाति के लोग बिना शादी ही साथ रहना शुरू कर देते हैं और ये समाज में स्वीकार्य भी है। हालांकि, ये मॉडर्न लिव-इन से ये अलग है क्योंकि संतान होने पर दोनों ही उसकी जिम्मेदारी निभाते हैं।

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    विशेषता हो जाएगी खत्म 

    गौर करने वाली बात यह है कि धीरे-धीरे इन समाज में बहुविवाह की प्रथा कम होते दिख रही है। जैसे-जैसे इन जनजातियों के लोग शहरों का रुख कर रहे हैं, आधुनिकता के करीब आ रहे हैं, वो पुराने चलन से खुद को दूर करते जा रहे हैं। राज्य सरकार ने ड्राफ्ट बनाने के दौरान उन क्षेत्रों का दौरा किया, जहां ये जनजातियां अधिक आबादी में हैं। उनके तौर तरीकों और रहने के हिसाब से उन्हें UCC से बाहर रखने का फैसला किया गया।

    माना गया कि मुख्यधारा में रहने वाले लोगों की शादियों और परंपराओं को जनजातियों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। नहीं तो इससे इसकी विशेषता खत्म हो जाएगी। बता दें, इन 5 जनजातियों में सबसे अधिक थारू जनजाति के लोग हैं, वहीं भोटिया सबसे कम संख्या और कम विकसित समाज है।

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