चंडीगढ़: पंजाब की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के रूप में जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
जालंधर में रविवार (6 सितंबर) को आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि किसी भी हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की नियुक्ति के लिए संबंधित राज्य सरकार और मुख्यमंत्री का परामर्श तथा सहमति अनिवार्य होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने इस मामले में तय संवैधानिक व मानक प्रक्रिया का खुला उल्लंघन किया है, जिससे राज्य सरकार पूरी तरह असहमत है।
🚨 सीएम भगवंत मान ने बुलाई कैबिनेट की इमरजेंसी बैठक: तय होगी आगे की रणनीति
बैठक का एजेंडा और सरकार का रुख:
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इमरजेंसी बैठक: मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने रविवार शाम 4 बजे राज्य मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की आपात बैठक बुलाई।
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रणनीतिक चर्चा: बैठक में जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति में अपनाई गई प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा की जाएगी और केंद्र के फैसले के खिलाफ आगामी विधिक व राजनीतिक कदम तय किए जाएंगे।
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संवैधानिक प्रावधान: मंत्री चीमा ने ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (MoP) के पैरा नंबर-6 का हवाला देते हुए बताया कि नियुक्ति से पहले राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह और सहमति लेना संवैधानिक बाध्यता है।
📜 ‘दो हफ्ते में जल्दबाजी, जबकि मप्र में 2 महीने रोकी फाइल’: केंद्र की मंशा पर सवाल
जस्टिस जीएस संधावालिया के मामले का हवाला:
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भेदभाव का आरोप: वित्त मंत्री ने सवाल उठाया कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने जस्टिस जीएस संधावालिया की नियुक्ति की फाइल को दो महीने से अधिक समय तक रोके रखा, जिसके बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश स्थानांतरित किया गया।
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जल्दबाजी पर आपत्ति: इसके विपरीत, जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा के मामले में राज्य को विचार करने के लिए महज दो हफ्ते का समय मिला था, लेकिन केंद्र सरकार ने प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही जल्दबाजी में नियुक्ति आदेश जारी कर दिया।
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संवेदनशील मामला: उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ स्थित पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट दोनों राज्यों की न्यायिक व्यवस्था का शीर्ष केंद्र है, इसलिए ऐसी नियुक्तियों में मनमानी स्वीकार नहीं की जा सकती।
📩 राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री के पत्रों में भी पैरा-6 का उल्लेख: अनदेखी का आरोप
दस्तावेजों और पत्राचार का विवरण:
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राज्यपाल का पत्र: चीमा ने बताया कि पंजाब के राज्यपाल ने 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र भेजा था, जिसमें पैरा-6 के तहत राज्य का दृष्टिकोण और सहमति मांगी गई थी।
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केंद्रीय मंत्री का संदर्भ: केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा भेजे गए आधिकारिक पत्र में भी पैरा-6 की तय प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख था।
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प्रक्रिया की उपेक्षा: मंत्री ने आरोप लगाया कि जब दोनों आधिकारिक पत्रों में सहमति की अनिवार्यता दर्ज थी, तब केंद्र सरकार ने राज्य की राय का इंतजार किए बिना एकतरफा फैसला लेकर प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया।
🛑 ‘यह केवल सीएम नहीं, 3 करोड़ पंजाबियों का अपमान है’: वित्त मंत्री का तीखा हमला
राजनीतिक प्रतिक्रिया और जनाक्रोश:
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अल्पसंख्यक वर्ग की अनदेखी: हरपाल चीमा ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक वर्ग से संबंध रखने वाले योग्य जजों की प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है और पंजाब के अधिकारों की लगातार उपेक्षा हो रही है।
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पंजाबियों के साथ अन्याय: उन्होंने कहा कि यह केवल एक पद या जज का विषय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई सरकार और 3 करोड़ पंजाबियों के सम्मान का सवाल है।
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आगे का कदम: राज्य सरकार इस मामले को हर कानूनी और लोकतांत्रिक पटल पर मजबूती से उठाने की तैयारी कर रही है।


