Gustaakh Ishq Review In Hindi: आज के दौर में जब सिनेमाघरों में सिर्फ ढिशुम-ढिशुम और बड़े-बड़े स्पेशल इफेक्ट्स वाली फिल्में ही शोर मचा रही हैं, ऐसे में आज यानी 28 नवंबर को रिलीज हुई विभु पुरी की ‘गुस्ताख इश्क’ एक शांत, सुकून भरी सांस की तरह महसूस होती है. ये फिल्म उस दौर की याद दिलाती है जब फिल्में धीमी (old era of cinema is back) रफ़्तार से चलती थीं, मगर दिल को छू जाती थीं. ‘गुस्ताख इश्क’ भी आपको जल्दबाजी करने को नहीं कहती. ये कहती है, “रुकिए! बैठिए! इस कहानी को महसूस कीजिए.”

अब क्या ‘गुस्ताख इश्क’ की खामोशी दिल की धड़कनों को बढ़ाती है, या फिर बोर करती है? इस फिल्म को देखें कि ना देखें, ये जानने के लिए पढ़ें गुस्ताख इश्क का रिव्यू .

कहानी

फिल्म की कहानी है नवाबुद्दीन (विजय वर्मा) की, जो अपने मरहूम अब्बा जान की बंद पड़ी प्रिंटिंग प्रेस को फिर से जिंदा करने की धुन में लगा हुआ है. इस जुनून की तलाश में, उसे एक ऐसी चीज के बारे में पता चलता है जो उसे मशहूर बना सकती है, वो चीज है मशहूर शायर अजीज बेग (नसीरुद्दीन शाह) की शायरी जो कभी पब्लिश नहीं हो पाई.

 

 

old era of cinema is back – अजीज बेग एक होशियार लेकिन दुनिया से मुंह मोड़े हुए शायर हैं, जिन्हें नाम और शोहरत से कोसों दूर रहना पसंद है. वो अपनी बेटी मिन्नी (फातिमा सना शेख) के साथ एक शांत जिंदगी जी रहे हैं. नवाबुद्दीन, प्रिंटिंग प्रेस के रिवाइवल के लिए, अजीज के पास जाता है. वो बहाना बनाता है कि वह उनसे शायरी सीखना चाहता है, मगर असल इरादा उनके शायरियों की किताब को छापना है. मिन्नी भी नवाबुद्दीन का हौसला बढ़ाती है, कोशिश करती है कि उसके पिता अपने ‘जिद’ को छोड़ दें. लेकिन अजीज बेग अपनी जगह से टस से मस नहीं होते. अब क्या वो उन्हें मना पाएंगे, इन सबके बीच मिन्नी और नवाबुद्दीन की कहानी कौनसा मोड़ लेगी? ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर ‘गुस्ताख इश्क’ देखनी होगी.

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