अगर आपसे कोई पूछे की आपकी सबसे पसंदीदा फिल्म कौन सी है तो आप आपका जवाब शायद DDLJ ,शोले, या और कोई ऐसे एंटेरटेनिंग फिल्म होगी जिसका डयलॉग आज भी आपके ज़ुबान पर हो या उनके सीन्स आपके दिलों में आज भी जीवित हो।
आज करंट न्यूज़ हाल ही में रिलीज़ हुई Thappad Movie का मूवी रिव्यु करके बताएगा की आख़िर आपको ये मूवी क्यों देखनी चाहिए|
इंडियन सिनेमा ने ऐसे तो कई मनोरंजक फिल्मे हमें दी है लेकिन कभी कभी ही ऐसा होता है जब भारतीय सिनेमा कोई ऐसी फिल्म लेकर आए जिसमे न तो बड़े बड़े सेट हो न ही महंगे कपड़ें या बड़े स्टार्स लेकिन फिर भी ये फिल्म आपको मजबूर करती है अपनी कहानी से की आप एक बार अपने आप से सवाल करें और सोचे की ये कहानी कही आपकी या आपके आस पास की तो नहीं कही ये किरदार आपने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में तो नहीं देखें।Thappad Movie एक ऐसे फिल्म है जो आपको अपनी असलियत से मिलवाती है
Thappad Movie की कास्ट
Thappad Movie में तापसी पान्नू ,राम कपूर ,तन्वी आज़मी,दिया मिर्ज़ा ,मानव कौल ,कुमुद मिश्रा समेत कई ऐसे दिग्गज कलाकार है जो अपनी अदाकारी से इस फिल्म को और भी सराहनीये बनाते है|
भारतीय सिनेमा का नया स्तर दिखती है Thappad Movie

अच्छा सिनेमा क्या होता है? अच्छा सिनेमा वो होता है जो कहीं ना कहीं दर्शकों के दिलों दिमाग पर असर डालता है। प्रोजेक्ट के दौड़ में मशगूल बॉलीवुड में सिनेमा की कमी सभी देख रहे हैं मगर गाहे-बगाहे कुछ ऐसी फिल्में आ जाती है इसे देखकर आप कह उठते हैं वाह क्या सिनेमा है।
अनुभव सिन्हा उन इक्का दुक्का डायरेक्टर्स में से है जो अपने फिल्मो की कहानियो की वजह से जाने जाते है उनकी पहले की फिल्मे जैसे ‘मुल्क’,आर्टिकल 15 से भी बता चुके है की वो कैसे अपना काम करते है और एक बार फिर वो समाज को बिना ज़ोर जबरदस्ती के शांति से अपनी बात कहते नज़र आएंगे।
बस एक थप्पड़,है बस एक थप्पड़ पर नहीं मार सकता ये लाइन जैसे ही फिल्म में तापसी बोलती है आप इस फिल्म की वो बात समझ जाते है जो वो बड़ी ही सादगी से कह जाती है आप समझ जाते है की फिल्म आपको क्या समझना चाहती है ।
क्या है फिल्म की कहानी
बस एक थप्पड़ ही तो था। क्या करूं? हो गया ना। ज्यादा जरूरी सवाल है ये है कि ऐसा हुआ क्यों? बस इसी ‘क्यों’ का जवाब तलाशती है अनुभव सिन्हा की ये फिल्म थप्पड़। इसका ट्रेलर आपने देखा होगा तो कहानी का मोटा अंदाजा लग गया होगा कि अमृता (तापसी पन्नू) कैसे अपने पति विक्रम के प्रति समर्पित है।
उसके ख्वाबों को पूरा करने के लिए जी जान लगाए हुए है और फिर एक पार्टी में सबके सामने अचानक पति के थप्पड़ से उसके सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं। फिर एक औरत की जंग शुरू होती है एक ऐसे पति के साथ, जिसका कहना है कि मियां बीवी में ये सब तो हो जाता है। इतना बड़ा तो कुछ नहीं हुआ ना।
लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में कि बीवी क्यों भाग गई? जिस औरत की सास उससे ये कहती है कि घर समेट कर रखने के लिए औरत को ही मन मारना पड़ता है। जिस लड़की की अपनी मां उससे तलाक लेने का फैसला सुनकर यह कहती है कि यही सुनना रह गया था कि बेटी तलाक लेगी? क्या गलती हो गई थी हमसे? आसपास ऐसे लोगों से घिरी अमृता पूरे घटनाक्रम को कैसे आगे ले जाती हैं और अंत में क्या होता है, इस बात का अंदाजा ट्रेलर देखकर कतई नहीं लगाया जा सकता।
बिना शोर के फिल्म कह जाती अपनी बात
फिल्म का नाम सुनकर लगता है कि फिल्म घरेलू हिंसा पर आधारित है और न जाने कितनी मारधाड़ और चीख चिल्लाहट इस फिल्म में होगी। और अंत क्या होगा? पति से अलग हो जाती होगी या उसे माफ करके आगे बढ़ जाती होगी। इस सब्जेक्ट पर इससे पहले ऐश्वर्या की प्रोवोक्ट के बेहद हिंसक अंत का ऑप्शन भारतीय दर्शक पहले देख ही चुके हैं।
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लेकिन बिना हिंसक हुए और बिना भाषणबाजी दिखाए, डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने कहानी का अंत एक ऐसे खूबसूरत मोड़ पर किया है, जिसे सोच पाने की क्षमता अभी तक हमारे भारतीय पुरषसत्तात्मक समाज में तो बिल्कुल न के बराबर है। फिल्म में एक जगह कहा भी गया है कि अगर एक थप्पड़ पर अलग होने की बात हो जाए तो 50 परसेंट से ज्यादा औरतें मायके में हों।
लेकिन साथ ही ये फिल्म ये भी दर्शाती है की आख़िर औरतों को थप्पड़ कोई मरे ही क्यूँ?
समाज के मुँह पर थप्पड़ है फिल्म की कहानी
अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू ने पूरी फिल्म को ऐसे लिखा है जिसमें हमारे समाज की कड़वी सचाई छह अलग अलग किरदारों के जरिए सामने आती है। फिल्म का अंत उन सभी किरदारों के अच्छे और बुरे पहलू, मन में चलने वाली उलझनें, द्वंद्व और अंतरविरोधों को न सिर्फ सबके सामने रखती है बल्कि पूरे समाज को एक-एक ऑप्शन भी देकर जाती है, ताकि लाइफ जीने लायक बन सके।


