भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की आंतरिक कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है।
यह रिट याचिका प्रियंका मिश्रा और पीसी शर्मा की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है।
याचिका में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और उन्हें पुनः बहाल करने की संपूर्ण व्यवस्था तथा आयोग के भीतर नीतिगत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर संवैधानिक और वैधानिक प्रश्न खड़े किए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि करीब 10 महीने की अवधि के दौरान कम से कम 14 अवसरों पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच स्थापित सामूहिक निर्णय लेने की वैधानिक प्रक्रिया का कथित रूप से समुचित पालन नहीं किया गया। इसके साथ ही याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा औपचारिक रूप से दर्ज कराई गई आपत्तियों का भी प्रमुखता से हवाला दिया गया है।
📉 SIR के दौरान 13 करोड़ से अधिक नाम हटाने का दावा: बिहार से शुरू होकर अन्य राज्यों तक हुआ विस्तार
मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर संशोधन और आंकड़े:
-
बिहार से राष्ट्रव्यापी विस्तार: याचिका के अनुसार, जून 2025 में बिहार से शुरू हुई एसआईआर की यह प्रक्रिया धीरे-धीरे देश के अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू की गई।
-
13 करोड़ नाम हटाने का दावा: प्रकाशित आंकड़ों और रिपोर्ट्स के हवाले से याचिका में कहा गया है कि करीब 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रारूप मतदाता सूची (Draft Electoral Rolls) से 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
-
संदेह के घेरे में प्रक्रिया: याचिका में इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया की पारदर्शिता और औचित्य पर विस्तृत समीक्षा की मांग की गई है।
📝 Form-6 में बदलाव और ERONet डेटा प्रबंधन पर गंभीर आपत्ति: नियमों के उल्लंघन का आरोप
पंजीकरण फॉर्म और तकनीकी नियंत्रण से जुड़ी आपत्तियां:
-
Form-6 में अतिरिक्त घोषणा: नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए प्रयुक्त होने वाले वैधानिक Form-6 में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त घोषणाएं (Declarations) शामिल किए जाने पर भी सवाल उठाया गया है।
-
आयुक्तों की आपत्ति: याचिका के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए स्पष्ट किया था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए निर्धारित नियमों में विधिवत संशोधन आवश्यक है। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस पर अपनी आपत्ति जताई।
-
ERONet तक सीमित पहुंच: याचिका में चुनावी डेटा प्रबंधन पर चिंता जताते हुए आरोप लगाया गया है कि राज्य स्तरीय अधिकारियों के पास ‘ERONet’ सिस्टम पर पूर्ण पहुंच (Full Access) नहीं थी, जिससे निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के वैधानिक और स्वतंत्र कामकाज प्रभावित हुए।
📍 गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का विशेष उल्लेख: तकनीकी अड़चनें और लाखों अपीलें
राज्यों में सामने आई व्यावहारिक समस्याओं का ब्योरा:
-
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला: याचिका में उदाहरण देते हुए बताया गया है कि गोवा में 97 मतदाताओं को संबंधित ईआरओ द्वारा दस्तावेजों की जांच के बाद पात्र पाया गया था, लेकिन कथित रूप से सॉफ्टवेयर में उनके नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध न होने के कारण अंतिम सूची प्रकाशित होने तक उनके नाम शामिल नहीं किए जा सके।
-
बंगाल में 16.10 लाख अपीलों की जांच: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से संबंधित करीब 16.10 लाख अपीलों के दाखिल किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि इन अपीलों को दर्ज करने के अधिकार, स्वीकृति देने वाले अधिकारियों और समूची निर्णय प्रक्रिया का मूल रिकॉर्ड अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट से मुख्य मांगें: डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित करने और धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करने की अपील
शीर्ष अदालत के समक्ष रखी गई मुख्य राहतें:
-
आयोग के निर्णयों की न्यायिक जांच: याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह चुनाव आयोग के निर्णयों और संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड की गहन न्यायिक जांच कराए।
-
संवैधानिक प्रक्रिया की बहाली: मतदाता सूची और Form-6 में बदलाव से जुड़े सभी कदमों में स्थापित संवैधानिक व वैधानिक नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
-
रिकॉर्ड और लॉग सुरक्षित रखने के आदेश: चुनाव आयुक्तों के बीच हुई बैठकों, फाइल नोटिंग्स, मिनट्स, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स और डेटा सिस्टम के तमाम ऑडिट लॉग्स को सुरक्षित (Preserve) रखने का निर्देश दिया जाए।
-
धारा 16 को चुनौती: याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को भी सीधे तौर पर चुनौती दी गई है और इस विवादित प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।


