झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्यभर के पारा शिक्षकों (जिन्हें वर्तमान में सहायक अध्यापक कहा जाता है) के पक्ष में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और निर्णायक आदेश पारित किया है। अदालत ने राज्य सरकार और झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JEPC) द्वारा जारी किए गए उन सभी प्रशासनिक आदेशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिनके जरिए इन शिक्षकों को उनकी सेवाओं से अलग कर दिया गया था। अदालत ने दो टूक शब्दों में यह स्पष्ट किया है कि जिस समय इन शिक्षकों की नियुक्तियां हुई थीं, यदि वे उस दौर की सभी अनिवार्य योग्यताओं और अर्हताओं को पूरा करते थे, तो लगभग बीस वर्षों की लंबी और निरंतर सेवा के बाद भविष्य में उपजे किसी भी योग्यता संबंधी तकनीकी विवाद का हवाला देकर उन्हें अचानक सेवामुक्त नहीं किया जा सकता।
🏛️ जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने सुनाया फैसला, 11 रिट याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई के बाद दिए निर्देश
माननीय उच्च न्यायालय के अधिवक्ता धीरज कुमार से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने देवघर, दुमका, हजारीबाग, पूर्वी सिंहभूम और साहिबगंज समेत राज्य के विभिन्न जिलों से जुड़ी कुल 11 रिट याचिकाओं (सीताराम मांझी एवं बनाम राज्य सरकार व अन्य) पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने अपने निर्देश में साफ किया है कि प्रभावित सभी शिक्षकों को सहायक अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रखने की अनुमति दी जाए। इसके साथ ही, पिछले कुछ समय यानी अगस्त 2024 से इन शिक्षकों द्वारा दी गई सेवाओं के एवज में रोके गए वेतन और मानदेय का भुगतान भी समय पर सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को औपचारिकताएं पूरी करते हुए अगले आठ सप्ताह के भीतर पूरा करने की सख्त समय-सीमा तय की है।
📜 2003 से 2006 के बीच हुई थी नियुक्तियां, हिंदी साहित्य सम्मेलन के मध्यमा प्रमाणपत्र को लेकर दिया गया बड़ा हवाला
अदालत ने अपने फैसले में पाया कि इन सभी याचिकाकर्ता शिक्षकों की बहाली वर्ष 2003 से 2006 के बीच विज्ञापित नियमों और प्रावधानों के तहत हुई थी। उस समय न्यूनतम शैक्षणिक पात्रता ‘मैट्रिक’ निर्धारित थी, जिसे पूरा करने की बात खुद राज्य सरकार ने भी स्वीकार की थी। इसके बाद के वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) के नए मानकों के अनुरूप इंटरमीडिएट स्तर की योग्यता प्राप्त करने के लिए शिक्षकों को पर्याप्त समय (लगभग आठ वर्ष) प्रदान किया गया था। इसी क्रम में सक्षम प्राधिकार से विधिवत अनुमति लेकर कई अध्यापकों ने हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज से ‘मध्यमा’ की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। फैसले में वर्ष 2012 के एक महत्वपूर्ण एलपीए (LPA संख्या 117/2012) का विशेष रूप से उल्लेख किया गया, जिसमें खंडपीठ ने मध्यमा प्रमाणपत्र को इंटरमीडिएट (+2) के समकक्ष माना था और तत्कालीन सरकार ने उस न्यायिक निर्णय को लागू भी किया था।
🛑 मनमाने ढंग से सेवा समाप्त करना विधि विरुद्ध, कोर्ट ने कहा- दो दशक की सेवा के बाद दंडात्मक कार्रवाई न्यायसंगत नहीं
माननीय पीठ ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि जब एक बार न्यायिक व्यवस्था अंतिम रूप से तय हो चुकी हो और उसका अनुपालन भी किया जा चुका हो, तो वर्षों बाद उसी पुराने आधार पर प्रशासन द्वारा कोई भी प्रतिकूल रुख अख्तियार करना कतई न्यायसंगत नहीं है। पीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी संविदा या सेवा व्यवस्था में अचानक कार्य से हटाना एक गंभीर दंड की श्रेणी में आता है। तय नियमों और वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर किसी शिक्षक को कार्यमुक्त करना या उसका पारिश्रमिक रोकना पूरी तरह से विधि विरुद्ध है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सीधे तौर पर नियमित सरकारी शिक्षक के दर्जे की मांग नहीं कर सकते, परंतु वर्ष 2021 की संबंधित नियमावली के तहत उनके वैधानिक सेवा अधिकारों को मनमाने तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता।


