झारखंड की राजधानी रांची के चर्चित बड़गाईं स्थित 8.86 एकड़ जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़ा और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ आरोप गठन (फ्रेमिंग ऑफ चार्जेस) को लेकर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की विशेष अदालत में अब शाम 4:30 बजे सुनवाई होगी। आज सुबह 11:30 बजे जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो मुख्यमंत्री की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि आरोप गठन की मेंटेबिलिटी (पोषणीयता) को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में आज ही महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है, इसलिए अदालत से कुछ समय देने का अनुरोध किया गया। इस पर विशेष अदालत ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए शाम 4:30 बजे का नया समय मुकर्रर किया और यह भी निर्देश दिया कि इस समयानुसार सीएम हेमंत सोरेन को ऑनलाइन माध्यम से अदालत के समक्ष उपस्थित रहना होगा।
🏛️ हाईकोर्ट के फैसलों पर टिकी सबकी निगाहें, मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में दोपहर 2:15 बजे होनी है विस्तृत सुनवाई
दरअसल, मुख्यमंत्री की कानूनी टीम की ओर से पीएमएलए कोर्ट में चल रही कार्रवाई और आरोप गठन की मेंटेबिलिटी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इस पर बीते 29 सितंबर को हाईकोर्ट में आंशिक सुनवाई पूरी हुई थी। इसके बाद मंगलवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की विस्तृत और क्रमिक सुनवाई के लिए बुधवार यानी 30 सितंबर को दोपहर 2:15 बजे का समय तय किया था। इससे पहले गत 24 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री के अधिवक्ताओं ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा सौंपे गए ‘अन-रिलाइड डॉक्यूमेंट’ (अविश्वासी दस्तावेजों) के सत्यापन के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी, जिसके चलते सुनवाई की अगली तारीख 30 सितंबर निर्धारित की गई थी।
❌ व्यक्तिगत पेशी से छूट वाली याचिका पहले हो चुकी है खारिज, अब PMLA की धारा की वैधता पर उठे सवाल
इससे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में एक इंटरलाेक्यूरी एप्लीकेशन (IA) दाखिल कर विशेष अदालत में अपनी व्यक्तिगत पेशी से छूट देने की गुहार लगाई गई थी। हालांकि, 18 सितंबर को जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मुख्यमंत्री की इस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था। अब वर्तमान में मुख्यमंत्री की कानूनी टीम की ओर से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 44 (1)(d) की संवैधानिक वैधता और उसके प्रावधानों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं, जिस पर न्यायपालिका के रुख का सभी को इंतजार है।


