पितृपक्ष का समय हिन्दू धर्म में पूर्वजों को स्मरण और तर्पण का विशेष अवसर माना जाता है. पंचांग के अनुसार, इस बार पितृपक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर 2025 तक चलेगा और इस दौरान काशी में लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराएंगे. खास बात यह है कि इस (Tripindi Shraddha) बार पितृपक्ष 14 दिनों का होगा क्योंकि मलमास के कारण हर तीन साल पर इसकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. पिशाच मोचन कुंड, जिसे विमलोदक कुंड के नाम से भी जाना जाता है, अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है. स्कंद पुराण में वर्णित यह कुंड, माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव के गण कपर्दिश्वर ने बनवाया था.
त्रिपिंडी श्राद्ध क्यों है इतना खास?
त्रिपिंडी श्राद्ध एक ऐसा विशेष अनुष्ठान है जो तीन वर्षों तक श्राद्ध न मिलने के कारण उत्पन्न हुए पितृ दोष को दूर करने के लिए किया जाता है. इस अनुष्ठान में तीन घंटे की पूजा होती है, जिसमें स्नान, ध्यान और दान जैसी क्रियाएं शामिल हैं. पूजा के दौरान चावल, जौ और तिल के आटे से पिंड बनाए जाते हैं और त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा की जाती है. इस पूजा का मुख्य उद्देश्य पितरों को संतुष्ट करना और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करना है.
त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान स्थल
त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान पिशाच मोचन कुंड के सात घाटों पर किया जाता है. शेर वाला घाट के तीर्थ पुरोहित कृष्णा पाण्डेय के मुताबिक, इन सात घाटों में शामिल हैं.
- बांकड़े घाट
- शेर वाला घाट
- पिशाच मोचन घाट
- दीक्षित घाट
- नया घाट
- मिश्रा घाट
- उपाध्याय घाट
त्रिपिंडी श्राद्ध करने के बाद, श्रद्धालु पास स्थित कपर्दिश्वर महादेव का जलाभिषेक करते हैं. कहा जाता है (Tripindi Shraddha) कि इस अनुष्ठान को पूरा करने के बाद ही गया जी जाकर पितरों को बिठाया जाता है.

