चातुर्मास की शुरुआत भी सावन से ही होती है और सावन शिव का प्रिय महीना है. इस माह में शिव ने हलाहल विष को पिया था. आप भी अपने दोषों को दूर करने के लिए इन चार माह में शिव की भक्ति और आराधना कर सकते हैं.
धार्मिक
हिन्दू धर्म में दर्श अमावस्या पितरों को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है. इस दिन रात के समय किए गए कुछ विशेष उपाय आपके बिगड़े कामों को बनाने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने में बहुत प्रभावी माने जाते हैं.
हिंदू धर्म में पूजा के समय पति-पत्नी का एक साथ बैठना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है, जो पूर्ण रूप से दांपत्य सुख का प्रतीक है. विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का पवित्र बंधन माना जाता है.
हमारे जीवन में गुरु ग्रह का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. कुंडली में इनकी शुभ स्थिति और मजबूती आपके जीवन को संवार देती है, वहीं कुंडली में बृहस्पति ग्रह का बिगड़ा होना आपके जीवन में विभिन्न तरह की परेशानियों को जन्म देता है. ये दोनों ही देवता हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है इनकी कृपा ना होने पर दुख और दरिद्रता को झेलना पड़ता है.
आषाढ़ मास का पहला प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ रहा है. सोमवार को पड़ने के कारण इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जा रहा है. सोम प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं.
पूरा नौतपा बिना तपे निकल गया. भुवन भास्कर भगवान सूर्य रोहिणी नक्षत्र से निकलकर मार्गशीर्ष नक्षत्र में प्रवेश कर चुके हैं. कायदे से इस नक्षत्र में बारिश की फुहारे पड़नी चाहिए, लेकिन सबकुछ उल्टा हो रहा है. शायद सूर्यदेव ही कन्फ्यूज हो गए हैं या फिर उनकी नक्षत्रों से बन नहीं रही. इसलिए वह अपनी उल्टी चाल चल रहे हैं.
नीम करोली बाबा की शिष्या सिद्धि मां, जिन्होंने बाबा की आध्यात्मिक विरासत को ना केवल संभाला बल्कि उसकी ख्याति को और आगे बढ़ाया. बाबा के ब्रह्मलीन होने के बाद बाबा की आध्यात्मिक विरासत को संभालने वाली शख्सियत सिद्धि मां ही थीं.
एकादशी का व्रत माह में दो बार किया जाता है. यह व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित हैं. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने वाले पर भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है. आषाढ़ (fast of ekadashi) माह में सबसे पहले योगिनी एकादशी, उसके बाद देवशयनी
ग्रहों के राजा सूर्यदेव अपनी मित्र राशि वृषभ से निकलकर बुध की राशि मिथुन में प्रवेश करने जा रहे हैं. सूर्यदेव का ये गोचर कुछ राशि वालों के लिए फायदेमंद साबित होने वाला है. सूर्य का गोचर 15 जून 2025, दिन रविवार को होगा. इस गोचर को मिथुन संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है.
कुर्बानी का पर्व ईद उल-अज़हा 7 जून को मनाया जाएगा. इस पर्व को पूरा देश बहुत हर्ष और उल्लास के साथ मनाएगा. ईद उल-अज़हा को बकरीद के नाम से भी जाना जाता है. जिसे इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार कहा जाता है. बकरीद ईद उल फितर के 2 महीने 9 दिन बाद मनाई जाती है.

