चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने संपत्ति और दस्तावेजों के पंजीकरण से जुड़े एक बेहद अहम फैसले में स्थिति स्पष्ट की है।

अदालत ने कहा कि किसी भी दस्तावेज को पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किए जाने पर सब-रजिस्ट्रार केवल मौखिक रूप से इनकार नहीं कर सकता। कानूनन सब-रजिस्ट्रार को या तो संबंधित दस्तावेज का नियमानुसार पंजीकरण करना होगा या फिर पंजीकरण से इनकार करने का ठोस और कारणयुक्त लिखित आदेश पारित करना होगा। अदालत ने इसे सब-रजिस्ट्रार की अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी करार दिया है।

⚖️ गुरुग्राम निवासी की याचिका पर सुनवाई, 2014 में खरीदे गए 9.28 लाख के स्टांप पत्रों से जुड़ा है मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस कुलदीप तिवारी की एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश गुरुग्राम निवासी ओसी कंवर की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2014 में खरीदे गए स्टांप पत्रों के आधार पर अपनी संपत्ति के बिक्री विलेख (Sale Deed) का पंजीकरण कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में उन्होंने बताया था कि गुरुग्राम के चक्करपुर और सुखराली गांव स्थित संपत्ति की खरीद के लिए उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से 9.28 लाख रुपये मूल्य के वैध स्टांप पत्र खरीदे थे।

💻 जीआरएन पेंडिंग और फेल्ड का तकनीकी पेंच, चेक से किया गया था पूरा भुगतान

याचिका के अनुसार, 4 अक्टूबर 2017 को जब मूल स्टांप पत्रों के साथ बिक्री विलेख सब-रजिस्ट्रार के समक्ष पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया, तो सब-रजिस्ट्रार ने मौखिक रूप से इनकार कर दिया।

अधिकारी का तर्क था कि संबंधित जीआरएन (सरकारी रसीद संख्या) का उपयोग पहले ही हो चुका है। वहीं, ट्रेजरी अधिकारी ने अदालत को बताया कि ई-ग्रास (e-GRAS) पोर्टल पर लेन-देन की स्थिति “पेंडिंग” (Pending) दर्शा रही थी, जबकि सब-रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड में वही जीआरएन “फेल्ड” (Failed) दिख रहा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने स्टांप शुल्क का पूरा भुगतान चेक के माध्यम से किया था और सभी दस्तावेज दुरुस्त थे।

📜 3 साल बाद दस्तावेज पेश करने पर सरकार का तर्क, कोर्ट ने कहा- निर्णय का अधिकार सब-रजिस्ट्रार का ही

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के पक्ष रखते हुए भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 49 और 50 का हवाला दिया गया।

सरकारी वकील ने तर्क दिया कि स्टांप पत्र खरीदने के लगभग तीन वर्ष बाद दस्तावेज पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया, जिससे उसकी वैधता पर सवाल खड़ा होता है। हालांकि, राज्य सरकार ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि इस पूरे विवाद की विस्तृत जांच करने और लिखित निर्णय पारित करने का वैधानिक अधिकार क्षेत्र संबंधित सब-रजिस्ट्रार के पास ही निहित है।

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