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    होली : रंगो का त्यौहार जानिए क्या हैं इसका पूरा इतिहास…….

    March 5, 2020 मनोरंजन 8 Mins Read
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    रंगों के त्यौहार’ के तौर पर मशहूर होली का त्यौहार फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। तेज संगीत और ढोल के बीच एक दूसरे पर रंग और पानी फेंका जाता है। भारत के अन्य त्यौहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

    होली एक ऐसा त्यौहार है जो अपने रंगो के साथ ढेर सारी खुशिया भर के लाता है ये त्यौहार गांव हो या शहर सभी जगह ढोल बाजे के साथ नाच- गा के मनाया जाता हैं|ढेर सारे पकवान बना कर बड़े उत्साह के साथ रंगो भरे इस रंगीन त्यौहार की शुरुआत करते है|

    इस त्यौहार के आने से लोगो के बीच की बुराई खत्म हो जाती है क्योकिं लोग इस त्यौहार को मनाने के लिए लोग एक दूसरे को रंग लगाने के बहाने मिलने जाते है और रंग लगा कर आपसी लड़ाई- झगड़े को मिटा कर गले मिलते है|

    होली का त्यौहार बुराई को खत्म कर अच्छाई और प्रेम के रास्ते पर मिलजुल कर चलने का संदेश देता है| प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार होली का त्यौहार, हिरण्यकश्यप की कहानी से जुड़ी है।

     

    होली का इतिहास

    हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस की तरह था। वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने सालों तक प्रार्थना की। आखिरकार उसे वरदान मिला।

    लेकिन इससे हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने को कहने लगा। इस दुष्ट राजा का एक बेटा था जिसका नाम प्रहलाद था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था।

    प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया।

    उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई।

    होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्यौहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है।

     

    Holi

    इन्हे भी पढ़ें:-होली के रंगो से कैसे अपनी स्किन का रखें ख्याल?

    कैसे बने “रंग” होली का हिस्सा ?

    यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के समय तक जाती है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे, इसलिए होली का त्योहार रंगों के रूप में लोकप्रिय हुआ। वे वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली मनाते थे। वे पूरे गांव में मज़ाक भरी शैतानियां करते थे। आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं मनाई जाती।

     

    Holi

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    सामाजिक मान्यता

    इस दिन लोग आपसी कटुता और वैरभाव को भुलाकर एक-दूसरे को इस प्रकार रंग लगाते हैं कि लोग अपना चेहरा भी नहीं पहचान पाते हैं। रंग लगने के बाद मनुष्य शिव के गण के समान लगने लगते हैं जिसे देखकर भोलेशंकर भी प्रसन्न होते हैं। इस दिन शिव और शिवभक्तों के साथ होली के प्यारभरे रंगों का आनंद लेते हैं व प्रेम एवं भक्ति के आनंद में डूब जाते हैं।

    होली बसंत का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दियां खत्म होती हैं। कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध बसंत की फसल पकने से भी है। किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में  मनाते हैं। इसे ‘बसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं।

    प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर भी होली की मूर्तियां बनी हैं। ऐसा ही 16वीं सदी का एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है। इस मंदिर में  इस त्यौहार के कई दृश्य हैं जिसमें राजकुमार, राजकुमारी अपने दासों सहित एक दूसरे पर रंग लगा रहे हैं।

    कई मध्ययुगीन चित्र, जैसे 16वीं सदी के अहमदनगर चित्र, मेवाड़ पेंटिंग, बूंदी के लघु चित्र, सब में अलग अलग तरह होली मनाते देखा जा सकता है।
    आइये आपको बताते हैं प्राचीन समय में होली के रंग के लिए क्या प्रयोग करते थे ?

    पहले रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों की परिभाषा बदलती गई।

    आज के समय में लोग रंग के नाम पर कठोर रसायन का उपयोग करते हैं। इन खराब रंगों के चलते ही कई लोगों ने होली खेलना छोड़ दिया है। हमें इस पुराने त्यौहार को इसके सच्चे स्वरुप में ही मनाना चाहिए|

     

     सभी धर्मो का है यह त्यौहार

    इस पवित्र त्यौहारों के सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है | साथ ही भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं ‘मुसलमान’ भी मनाते हैं|

    अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन इतिहास में है|अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है|

    शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था| शाहजहां के ज़माने में इस पवित्र त्यौहार को ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) कहा जाता था|शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था|

    शाहजहां के ज़माने में होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) कहा जाता था| मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे| वहीं हिन्दी साहित्य में कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तार रूप से वर्णन किया गया है|

    होली की मिठास रंगो और गुजिया के साथ

    प्रेम, सद्भाव और रंगों का त्यौहार है। यह पर्व हमें ढेर सारी मौज मस्ती करने का मौका देता है साथ ही लोगों की जिंदगी में रंग भरने का काम करता है। यह त्यौहार पूरे भारत में बेहद हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है।

     

    Holi

    इस दिन लोग एक दूसरे को प्यार से रंग-बिरंगे गुलाल लगाते हैं एवं बच्चे अपनी पिचकारी और गुब्बारे भरकर एक-दूसरे पर फेंकते हैं। इस मौके पर जगह-जगह पार्टी एवं रंगारंग कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है।

    इस दिन कई हिन्दू परिवारों में गुझिया समेत कई पारंपरिक पकवान भी बनाए जाने की परंपरा हैं। हालांकि, बदलते वक्त के साथ इस त्योहार को मनाने का तरीका बदल गया लेकिन आज भी इस पर्व को मनाने का उद्देश्य एक ही है। इस त्योहार के मौके पर जो लोग अपनों से दूर रहते हैं, वो होली की शुभकामनाये इंटरनेट के माध्यम से देते हैं|

    ये भी जरूर पढ़ें:-मॉइश्चराइजर :मतलब,फायदे,बनाने के तरीके और इनके इस्तेमाल

    होली समारोह

    होली एक दिन का त्यौहार नहीं है। कई राज्यों में यह तीन दिन तक मनाया जाता है।

    1 – पूर्णिमा के दिन एक थाली में रंगों को सजाया जाता है और परिवार का सबसे बड़ा सदस्य बाकी सदस्यों पर रंग छिड़कता है।

    2 – इसे पूनो भी कहते हैं। इस दिन होलिका के चित्र जलाते हैं और होलिका और प्रहलाद की याद में होली जलाई जाती है। अग्नि देवता के आशीर्वाद के लिए मांएं अपने बच्चों के साथ जलती हुई होली के पांच चक्कर लगाती हैं।

    3 – इस दिन को ‘पर्व’ कहते हैं और यह होली उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन एक दूसरे पर रंग और पानी डाला जाता है। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों पर भी रंग डालकर उनकी पूजा की जाती है|

    होली के इस रंगीन त्यौहार पर करेंट न्यूज़ की तरफ से कुछ पंक्तिया –

    भेदभाव को खत्म कर आओ खेले प्यार की होली…..

    अबकी होली में हो जाये, कुछ एसा अदभुत चमत्कार
    हो जाये भ्रष्टाचार स्वाहा, महगाई,झगड़े, लूटमार
    सब लाज शर्म को छोड़ – छाड़,हम करें प्रेम से छेड़ – छाड़
    गौरी के गोरे गालों पर ,अपने हाथों से मले गुलाल
    जा लगे रंग,महके अनंग,हर अंग अंग हो सरोबार
    इस मस्ती में,हर बस्ती में,बस जाये केवल प्यार प्यार
    दुर्भाव हटे,कटुता सिमटे,हो भातृभाव का बस प्रचार
    अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार॥

    Image Source:-www.currentnewsdainik.com

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