नई दिल्ली: सनातन धर्म में रक्षाबंधन का त्योहार अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना गया है। इस वर्ष यह पर्व 28 अगस्त (शुक्रवार) को पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, रक्षा सूत्र केवल सूत का धागा नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण, सुरक्षा और अटूट विश्वास का (importance of raksha sutra) पवित्र प्रतीक है। रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी दीर्घायु, उन्नति और मंगलमय जीवन की कामना करती हैं।
सच्चे भाव से बंधे रक्षा सूत्र की अमर कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, शिशुपाल वध के दौरान भगवान श्री कृष्ण की उंगली सुदर्शन चक्र के वेग से कट गई और रक्त बहने लगा।रक्त प्रवाह रोकने के लिए द्रौपदी ने बिना किसी संकोच के अपनी रेशमी (importance of raksha sutra) साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के निस्वार्थ प्रेम से अभिभूत होकर श्री कृष्ण ने आजीवन उनकी रक्षा करने का वचन दिया। जब हस्तिनापुर की भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ, तब भगवान कृष्ण ने अनंत वस्त्र प्रदान कर उनकी लाज बचाई।
जब रक्षा सूत्र से वैकुंठ लौटे भगवान विष्णु
भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान लेकर उनका संपूर्ण साम्राज्य ले लिया। बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर जब प्रभु ने वरदान मांगने को कहा, तो बलि ने भगवान विष्णु को अपने साथ पाताल लोक में रहने का आग्रह किया। भगवान विष्णु को पुनः वैकुंठ लाने के लिए माता लक्ष्मी ने एक सामान्य स्त्री का रूप धरकर राजा बलि को रक्षा सूत्र (राखी) बांधा और उन्हें अपना भाई बनाया। जब राजा बलि ने उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन मांगा। रक्षा सूत्र की मर्यादा का पालन करते हुए राजा बलि ने सहर्ष भगवान विष्णु को विदा किया।


