श्रीनगर/जम्मू-कश्मीर: केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) से सटे दूर-दराज के इलाके अब संघर्ष या तनाव की जगह पर्यटन की एक नई और आकर्षक पहचान बनते जा रहे हैं। अतीत में केवल घुसपैठ, भारी गोलाबारी और तनाव के लिए चर्चित रहने वाले केरन, गुरेज, तंगधार, टीटवाल, उरी और तुलैल घाटी जैसे (the era of shelling and infiltration is over) खूबसूरत सीमावर्ती गांव आज देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
7 सालों में 51 गुना बढ़ी पर्यटकों की आमद
हालात यह हैं कि इन इलाकों में स्थानीय निवासियों द्वारा चलाए जा रहे होमस्टे पूरी तरह से एडवांस्ड बुक चल रहे हैं और किशनगंगा नदी के मनमोहक किनारों पर लगाए गए टेंटों में भी अब तिल रखने की जगह नहीं बची है।आंकड़ों के मुताबिक, बीते 7 सालों में इन सीमावर्ती इलाकों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में 51 गुना की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2020 में जहां इन सीमावर्ती क्षेत्रों में केवल 7,900 पर्यटक आए थे, वहीं इस साल अब तक के शुरुआती 7 महीनों में ही 4 लाख से अधिक पर्यटक पहुंच चुके हैं।
पुश्तैनी घरों को होमस्टे में बदलकर पा रहे स्वरोजगार
पर्यटकों की इस निरंतर बढ़ती संख्या से स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है। पूर्व में रोजगार की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर चुके कई कश्मीरी परिवार अब अपने पैतृक गांवों में वापस लौट आए हैं और अपने पुश्तैनी घरों को खूबसूरत होमस्टे में तब्दील कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, बड़ी संख्या में स्थानीय युवा (the era of shelling and infiltration is over) अब टूर गाइड, एडवेंचर टेंट ऑपरेटर और टैक्सी चालक बनकर सम्मानजनक आजीविका कमा रहे हैं।


