Motilal Nehru Death Anniversary: कानपुर की अदालत में वकालत करने के दौरान ख्याति मिलने पर मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद (अब प्रयागराज) आ गए थे। हालांकि उसके पहले वे प्रयागराज में म्योर केंद्रीय महाविद्यालय में बीए की पढ़ाई करने भी आए थे। यहां उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की और जल्द ही वे नामचीन वकील में शुमार हो गए। उस समय मोतीलाल हजारों रुपये फीस लेते थे। सात अगस्त 1899 में उन्होंने भारद्वाज आश्रम के सामने 19 बीघे का एक भवन बीस हजार रुपये में खरीदा और उसका नए सिरे से निर्माण कराया। तब भवन एक मंजिला ही था। इस भवन को उन्होंने आनंद भवन नाम दिया। मोतीलाल आनंद भवन में भव्य पार्टियां दिया करते थे जिसमें प्रयागराज के नामचीन लोग आए करते थे। उसमें अंग्रेज अफसर भी शामिल होते थे। महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने पार्टियां देना बंद कर दिया और भारतीय तौर तरीकों को अपना लिया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो.जेएन पाल मोतीलाल नेहरू की बड़ी बेटी विजय लक्ष्मी की आत्मकथा ‘दि स्कोप ऑफ हैप्पीनेस के हवाले से बताते हैं कि 1919 में महात्मा गांधी के आहवान पर मोतीलाल ने वकालत छोड़ दी थी। इस आत्मकथा में विजय लक्ष्मी पंडित ने लिखा है कि उनके पिता पूरी तरह से पश्चिमी विचारों के कायल थे। इसी वजह से उन्होंने अपने सभी बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलवाई। उस दौर में मोतीलाल आनंद भवन में शानदार पार्टियां दिया करते थे। यह पार्टियां आए दिन हुआ करतीं थी। इन पार्टियों में देश के नामी गिरामी लोग शामिल हुआ करते थे। अंग्रेज अधिकारी भी पार्टी की शोभा होते थे। 1916 में महात्मा गांधी से संपर्क होने के उनके पिता में परिवर्तन आना शुरू हो गया।
उस दौर में मोतीलाल आनंद भवन में शानदार पार्टियां दिया करते थे। यह पार्टियां आए दिन हुआ करतीं थी। इन पार्टियों में देश के नामी गिरामी लोग शामिल हुआ करते थे। अंग्रेज अधिकारी भी पार्टी की शोभा होते थे।
Motilal Nehru Death Anniversary: कानपुर की अदालत में वकालत करने के दौरान ख्याति मिलने पर मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद (अब प्रयागराज) आ गए थे। हालांकि उसके पहले वे प्रयागराज में म्योर केंद्रीय महाविद्यालय में बीए की पढ़ाई करने भी आए थे। यहां उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की और जल्द ही वे नामचीन वकील में शुमार हो गए। उस समय मोतीलाल हजारों रुपये फीस लेते थे। सात अगस्त 1899 में उन्होंने भारद्वाज आश्रम के सामने 19 बीघे का एक भवन बीस हजार रुपये में खरीदा और उसका नए सिरे से निर्माण कराया। तब भवन एक मंजिला ही था। इस भवन को उन्होंने आनंद भवन नाम दिया। मोतीलाल आनंद भवन में भव्य पार्टियां दिया करते थे जिसमें प्रयागराज के नामचीन लोग आए करते थे। उसमें अंग्रेज अफसर भी शामिल होते थे। महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने पार्टियां देना बंद कर दिया और भारतीय तौर तरीकों को अपना लिया।
पार्टियों में शामिल होते थे अंग्रेज अफसर
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो.जेएन पाल मोतीलाल नेहरू की बड़ी बेटी विजय लक्ष्मी की आत्मकथा ‘दि स्कोप ऑफ हैप्पीनेस के हवाले से बताते हैं कि 1919 में महात्मा गांधी के आहवान पर मोतीलाल ने वकालत छोड़ दी थी। इस आत्मकथा में विजय लक्ष्मी पंडित ने लिखा है कि उनके पिता पूरी तरह से पश्चिमी विचारों के कायल थे। इसी वजह से उन्होंने अपने सभी बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलवाई। उस दौर में मोतीलाल आनंद भवन में शानदार पार्टियां दिया करते थे। यह पार्टियां आए दिन हुआ करतीं थी। इन पार्टियों में देश के नामी गिरामी लोग शामिल हुआ करते थे। अंग्रेज अधिकारी भी पार्टी की शोभा होते थे। 1916 में महात्मा गांधी से संपर्क होने के उनके पिता में परिवर्तन आना शुरू हो गया।
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जलियांवाला बाग प्रकरण के बाद बने थे कांग्रेस के अध्यक्ष
Motilal Nehru Death Anniversary: इतिहासकार प्रो.जेएन पाल बताते हैं कि अमृतसर में 1919 के जलियांवाला बाग प्रकरण के बाद मोतीलाल नेहरू ने वकालत छोड़ दी थी। उसी दौरान वह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। 1928 कलकत्ता अधिवेशन में वे कांग्रेस के फिर अध्यक्ष बने। उन्होंने 1923 में देशबंधु चितरंजन दास के साथ स्वराज पार्टी का गठन किया था। स्वराज पार्टी के जरिए ही वे सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में पहुंचे थे। उन्होंने आजादी के आंदोलन में भारतीयों का पक्ष रखने के लिए एक अखबार भी चलाया था। 1927 में कांग्रेस द्वारा स्थापित भारतीय संविधान आयोग के भी वे अध्यक्ष बने थे।
पिता गंगाधर दिल्ली के थे अंतिम कोतवाल
मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर दिल्ली के अंतिम कोतवाल थे। उस समय कोतवाल ही पुलिस का प्रमुख अधिकारी होता था। गंगाधर 1857 गदर के समय कोतवाल थे। उस समय मारकाट से घबरा कर वे परिवार सहित आगरा आ गए थे। पिता गंगाधर के निधन के तीन माह बाद मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ था। गंगाधर का निधन चार फरवरी 1961 को हुआ था। मोतीलाल का जन्म छह मई 1961 को हुआ था। इतिहासकार प्रो.अनिल कुमार दुबे बताते हैं कि मोतीलाल नेहरू का शुरूआती जीवन शानोशौकत से भरा था। देश की आजादी के लिए उन्होंने अपनी धनसंपदा और परिवार को ताक पर रख दिया। मोतीलाल नेहरू उस समय के देश के नामी वकील थे। हजारों रुपये फीस लेते थे। बड़े जमींदार और स्थानीय रजवाड़ों के वारिस उनके मुवक्किल हुआ करते थे। उन्होंने भारद्वाज आश्रम के पास एक अलीशान घर बनवाया और उसका नाम आंनद भवन रखा था।
1916 में महात्मा गांधी से मुलाकात होने पर छोड़ दिया था पश्चिमी तरीके से रहन सहन
Motilal Nehru Death Anniversary: इतिहासकार प्रो.दुबे बताते हैं कि मोतीलाल नेहरू की महात्मा गांधी से पहली मुलाकात 26 दिसंबर 1916 को लखनऊ में हुई थी। गांधी लखनऊ में कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित होने आए थे। वहीं पर मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल नेहरू के साथ गए थे। यहीं पर उनकी महात्मा गांधी से संक्षिप्त मुलाकात हुई थी। उसी मुलाकात में मोतीलाल एवं जवाहर लाल महात्मा गांधी के विचार से इतना प्रभावित हुए थे कि दोनों ने शानोशौकत भरा जीवन छोडऩे का निर्णय ले लिया था। मोतीलाल नेहरू इसी के बाद जमीन पर बिस्तर लगाकर सोने लगे थे। वे आजादी के आंदोलन के पहले कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए थे।
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