नई दिल्ली: शुक्रवार की मध्यरात्रि जैसे ही घड़ी की सुइयों ने 12 बजाए, समूचा देश भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के उल्लास और भक्ति में सराबोर हो गया।
प्रमुख मंदिरों से लेकर घर-घर में घंटे, घड़ियाल और शंखनाद गूंज उठे। चारों तरफ ‘जय कन्हैया लाल की’ और ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष सुनाई देने लगे। दिनभर निर्जला व फलाहार उपवास रखने के उपरांत श्रद्धालुओं ने आधी रात को विधि-विधान से बाल गोपाल का पूजन किया और परिवार के सुख, शांति व समृद्धि की मंगल कामना की।
जन्माष्टमी को लेकर सुबह से ही बाजारों, घरों और देवालयों में विशेष उत्साह का माहौल देखा गया। श्रद्धालुओं ने लड्डू गोपाल के लिए नवीन वस्त्र (पोशाक), नक्काशीदार मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और आभूषण खरीदे। घरों के पूजा स्थलों को सुगंधित फूलों, गुब्बारों और रोशनी से सजाया गया, जबकि मंदिरों में भव्य विद्युत सज्जा और कान्हा के जीवन से जुड़ी मनोहारी झांकियां प्रस्तुत की गईं।
✨ 12 बजे अवतरित हुए नंदलाल: पंचामृत से हुआ अभिषेक, झूले में विराजे बाल गोपाल
पूजा विधि और मध्यरात्रि का पूजन अनुष्ठान:
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पंचामृत स्नान: रात 12 बजते ही श्रद्धालुओं ने शंख ध्वनि के बीच लड्डू गोपाल का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से निर्मित पंचामृत से महाभिषेक संपन्न कराया।
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दिव्य श्रृंगार: अभिषेक के पश्चात कान्हा को स्वच्छ व नवीन वस्त्र धारण कराए गए और मोरपंख, चंदन तिलक, बांसुरी व कुंडल आदि आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार किया गया।
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झूला झुलाने की परंपरा: श्रृंगार पूर्ण होने के बाद बाल गोपाल को पुष्पों से सुसज्जित सुंदर पालने में विराजमान कराया गया और सभी भक्तों ने श्रद्धाभाव से उन्हें झूला झुलाया।
🍯 माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी का महाभोग: तुलसी दल के बिना अधूरा पूजन
नैवेद्य एवं भोग की धार्मिक मान्यताएं:
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प्रिय व्यंजनों का अर्पण: भगवान श्रीकृष्ण को उनके प्रिय माखन-मिश्री, पारंपरिक धनिया पंजीरी, पंचमेवा, मौसमी फल और मावे की मिठाइयों का श्रद्धापूर्वक भोग अर्पित किया गया।
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तुलसी दल का महत्व: सनातन परंपरा के अनुसार, भगवान विष्णु और उनके अवतारों को अर्पित किए जाने वाले नैवेद्य में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य माना जाता है, जिसके बिना भोग अधूरा रहता है।
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मंत्र जाप व आरती: पूजन के दौरान श्रद्धालुओं ने ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र का जप किया और कर्पूर व घी के दीपकों से भगवान की भव्य आरती उतारी।
⏳ 46 मिनट का रहा निशिता काल पूजा मुहूर्त: आधी रात संपन्न हुआ मुख्य अनुष्ठान
पूजा मुहूर्त की समय-सारणी:
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निशिता काल का समय: शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि (निशिता काल) में हुआ था।
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शुभ मुहूर्त अवधि: इस वर्ष निशिता काल का मुख्य पूजा मुहूर्त रात 11:57 बजे से प्रारंभ होकर देर रात 12:43 बजे तक (कुल 46 मिनट) मान्य रहा, जिसके मध्य में भक्तों ने मुख्य अभिषेक, पूजन और जन्म आरती की।
🌅 5 सितंबर को सुबह 6:08 बजे के बाद व्रत पारण: जानें शुभ समय और नियम
पारण मुहूर्त और धार्मिक विधान:
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पारण का समय: जो श्रद्धालु जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के पश्चात खोलते हैं, वे 5 सितंबर 2026 (आज) सुबह 06:08 बजे के उपरांत व्रत का पारण कर सकते हैं।
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अष्टमी व रोहिणी का समापन: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समापन के बाद पारण करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग मतों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पारण समय में आंशिक भिन्नता हो सकती है।
🪔 जन्माष्टमी पर इन प्रमुख स्थानों पर जलाएं दीपक: घर में आएगी सुख-समृद्धि
वास्तु व धार्मिक दृष्टिकोण से दीप प्रज्ज्वलन:
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पूजा स्थल: घर के मंदिर में लड्डू गोपाल अथवा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का अखंड अथवा नियमित दीपक जलाएं।
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तुलसी चौरा: संध्याकाल में तुलसी जी के पौधे के पास शुद्ध घी का दीपक जलाकर उनकी परिक्रमा करने से घर के कष्ट दूर होते हैं।
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मुख्य द्वार: घर की देहरी और मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर सायंकाल दीपक रखने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और महालक्ष्मी व कान्हा की कृपा से सुख-सौभाग्य का वास होता है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है.


