झारखंड में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के साथ ही ‘परिसीमन’ (Delimitation) का मुद्दा राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गया है। 2027 में जनगणना के नए आंकड़े आने के बाद विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण होना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन के बाद झारखंड विधानसभा में सीटों की संख्या मौजूदा 81 से बढ़कर 108 से 125 या उससे अधिक हो सकती है। यदि यह आंकड़ा 120 के पार जाता है, तो राज्य में विधान परिषद के गठन का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

⚠️ क्या कम हो जाएंगी आरक्षित सीटें?

राजनीतिक दलों और आदिवासी संगठनों के बीच सबसे बड़ा डर यह है कि आबादी के आधार पर परिसीमन होने से ST के लिए आरक्षित सीटें 28 से घटकर 21 रह सकती हैं। इसी आशंका के चलते राज्य में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। संविधान के 84वें संशोधन (2002) के कारण लंबे समय से रुकी यह प्रक्रिया अब एक बार फिर चर्चा में है।

📢 झामुमो की चेतावनी: हेमंत सोरेन करेंगे नेतृत्व

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने स्पष्ट कर दिया है कि आरक्षित सीटें घटाने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि पिछली बार भी विशेष प्रावधान कर परिसीमन को रोका गया था, और इस बार भी झामुमो दिल्ली से रांची तक निर्णायक लड़ाई लड़ेगा। उन्होंने यह भी साफ किया कि इस मुद्दे पर राज्य का नेतृत्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही करेंगे।

🤝 अन्य दलों का रुख और सर्वदलीय बैठक पर सवाल

परिसीमन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों में एकरूपता नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का मानना है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और यह होनी चाहिए, लेकिन इसमें जनजातीय समुदाय की राजनीतिक हकमारी नहीं होनी चाहिए। हाल ही में बंधु तिर्की द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से झामुमो और राजद समेत कई बड़े दलों की दूरी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मुद्दे पर श्रेय लेने की होड़ भी मची है। बैठक में केवल कांग्रेस और सीपीआई (माले) की मौजूदगी रही, जिससे अन्य दलों के बीच रणनीतिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं।

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