टोरंटो : कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु: दुनिया को मित्रता से अपनाओ’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारतीय सभ्यता (India is not a superpower) के मूल तत्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
India is not a superpower – उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कभी किसी पर दबाव बनाने वाली ‘महाशक्ति’ बनने की आकांक्षा से आगे नहीं बढ़ा, बल्कि समस्त मानवता की निस्वार्थ सेवा करने के कारण ही स्वाभाविक रूप से ‘विश्वगुरु’ कहलाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वभौमिक बंधुत्व, शरणागत की रक्षा और असीम विविधता का आदर भारत के सभ्यतागत डीएनए (DNA) का अभिन्न हिस्सा हैं।
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ह्वेन त्सांग की यात्रा: मोहन भागवत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि महान चीनी यात्री और विद्वान ह्वेन त्सांग जब नालंदा से ज्ञान और अमूल्य ग्रंथ लेकर लौट रहे थे, तब गंगा नदी पार करते समय उनकी नाव तूफान में घिर गई थी।
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ज्ञान की रक्षा में बलिदान: नाव का वजन कम करने के लिए जब मल्लाह ने ग्रंथ फेंकने को कहा, तो ह्वेन त्सांग के साथ मौजूद नालंदा के तीन भारतीय छात्रों ने बिना संकोच एक-एक कर नदी में छलांग लगा दी।
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विश्व कल्याण की भावना: छात्रों ने अपने प्राणों की आहुति इसलिए दी ताकि वह दिव्य ज्ञान सुरक्षित रूप से चीन तक पहुंच सके और वहां के लोगों का कल्याण कर सके।
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‘बिना युद्ध और धर्मांतरण के पूर्वजों ने दुनिया को दिया ज्ञान
भागवत ने कहा कि जब यातायात के आधुनिक साधन नहीं थे, तब हमारे मनीषी व पूर्वज पैदल ही हिमालय पार कर चीन, साइबेरिया, मंगोलिया और छोटी नावों के सहारे दक्षिण-पूर्व एशिया व मेक्सिको तक पहुंचे। भारतीय मनीषियों ने कभी किसी देश पर सैन्य आक्रमण नहीं किया और न ही किसी का धर्मांतरण कराया; बल्कि उन्होंने विश्वभर में गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद और उच्च जीवन मूल्यों का प्रकाश फैलाया।
