शिमला। पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी पत्नी भले ही फैमिली पेंशन पाने का कानूनी अधिकार न रखती हो, लेकिन यदि पहली पत्नी का निधन हो जाता है, तो लंबे समय तक साथ रहने के मानवीय आधार पर दूसरी पत्नी को वित्तीय संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। हाईकोर्ट की बेंच ने पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी का नाम सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने और उसे फैमिली पेंशन का लाभ देने का स्पष्ट आदेश जारी किया है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
📜 पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह अवैध, लेकिन अनैतिक नहीं: हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते किया गया दूसरा विवाह भले ही कानूनन अमान्य (Illegal) हो, लेकिन इसे सामाजिक रूप से अनैतिक कह देना उचित नहीं है।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नज़ीर फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि असहाय महिला को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना तथा उसकी सामाजिक सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखना ही फैमिली पेंशन योजना का मुख्य उद्देश्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सहजीवन (Co-habitation) और आर्थिक सशक्तिकरण के सिद्धांतों को ध्यान में रखना बेहद आवश्यक है।
🏛️ जानिए क्या है पूरा मामला: 2003 में रिटायर हुए कर्मचारी ने दर्ज कराई थी याचिका
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, यह याचिका महेश राम नाम के सेवानिवृत्त कर्मचारी द्वारा दायर की गई थी।
याचिकाकर्ता साल 2003 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पहली पत्नी कमलेश देवी का निधन 20 अप्रैल 2020 को हो गया था। दोनों की कोई संतान नहीं थी, जिसके चलते पहली पत्नी के जीवनकाल में ही महेश राम ने अपनी पत्नी की सहमति से उनकी बहन ज्वाला देवी के साथ दूसरा विवाह कर लिया था।
📝 पीपीओ और सर्विस रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने को लेकर शुरू हुआ था विवाद
पहली पत्नी कमलेश देवी की मृत्यु के पश्चात याचिकाकर्ता महेश राम ने पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) और अपने सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी ज्वाला देवी का नाम नामांकित करने का प्रशासनिक अनुरोध किया था।
जब विभाग ने इस अनुरोध को स्वीकार करने से मना कर दिया, तब यह कानूनी विवाद उत्पन्न हुआ और मामला अदालत पहुंचा। एकलपीठ के फैसले के खिलाफ सरकार ने अपील दाखिल की थी, जिसे अब खंडपीठ ने पूरी तरह से खारिज करते हुए पीड़ित पक्ष के अधिकार को बहाल रखा है।


