रोहतक: साध्वियों के यौन शोषण मामले में सुनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर 30 दिनों की पैरोल मिली है। यह 16वीं बार है जब वे जेल से बाहर आए हैं। उनकी पैरोल की टाइमिंग को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर मौके विधानसभा चुनावों या डेरा के बड़े कार्यक्रमों से ठीक पहले के होते हैं। यदि इस 30 दिन की अवधि को जोड़ दिया जाए, तो अपनी 8 साल 9 महीने की कुल सजा के दौरान राम रहीम अब तक लगभग 454 दिन जेल से बाहर रह चुके हैं।

📊 बार-बार जेल से बाहर आने का सिलसिला

राम रहीम की पैरोल का इतिहास देखें तो यह सिलसिला 2020 से लगातार जारी है। चाहे आदमपुर उपचुनाव हो, हरियाणा के नगर निगम चुनाव, पंजाब विधानसभा चुनाव, राजस्थान विधानसभा चुनाव या फिर हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव—राम रहीम की जेल से रिहाई अक्सर राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील समय पर होती रही है। इसके अलावा, 15 अगस्त का जन्मदिन, परमार्थ दिवस और डेरा स्थापना माह जैसे बड़े आयोजनों के दौरान भी वे लगातार बाहर रहे हैं।

⚖️ क्या कहता है जेल मैन्युअल?

डेरा प्रमुख की बार-बार रिहाई पर अक्सर प्रशासनिक और कानूनी बहस छिड़ती है। इसे समझने के लिए जेल मैन्युअल के दो प्रमुख प्रावधानों को जानना जरूरी है:

  • पैरोल (Parole): यह किसी विशेष कारण जैसे बीमारी, मृत्यु, विवाह या पारिवारिक जिम्मेदारी के लिए दी जाती है। एक साल में अधिकतम 91 दिन की पैरोल मिल सकती है। इसकी अवधि कैदी की कुल सजा में गिनी जाती है।

  • फरलो (Furlough): यह सजायाफ्ता कैदियों को समाज से जोड़ने के लिए दी जाती है। यह उन कैदियों को मिलती है जिन्होंने सजा के तीन साल पूरे कर लिए हों और जिनका जेल में चाल-चलन उत्तम रहा हो। इसके लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता नहीं होती।

📋 प्रक्रिया और निर्णय

जेल मैन्युअल के अनुसार, कैदी द्वारा आवेदन करने के बाद जेल प्रबंधन, डीसी (DC) और संबंधित कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर पैरोल या फरलो पर निर्णय लिया जाता है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होता है कि रिहाई से सार्वजनिक शांति भंग न हो। हालांकि, राम रहीम के मामले में जिस तरह से लगातार और बड़े आयोजनों से पहले पैरोल दी जाती रही है, वह निरंतर जनचर्चा और राजनीतिक विरोध का विषय बनी हुई है।

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