छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में आगामी शारदीय नवरात्र को लेकर उत्साह का माहौल है। आगामी 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ ही शारदीय नवरात्र की शुरुआत होने जा रही है। इसे लेकर रामानुजगंज में बंगाल से आए कुशल मूर्तिकार दिन-रात मेहनत कर मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। मूर्तिकारों की कोशिश है कि तय समय यानी 10 तारीख से पहले ही सभी पूजा पंडालों और समितियों तक मूर्तियां सुरक्षित पहुंचा दी जाएं। हालांकि, दूरदराज से आए इन कलाकारों का कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई ने उनके इस पारंपरिक कारोबार पर भी गहरा असर डाला है। कच्चे माल की कीमतों में भारी इजाफा होने के कारण उन्हें सभी साजो-सामान काफी महंगी दरों पर खरीदने पड़ रहे हैं, जिसके चलते मजबूरन उन्हें मूर्तियों के दाम भी बढ़ाने पड़े हैं। कलाकार बताते हैं कि यह उनका पुश्तैनी काम है जो दादा-परदादा के समय से चला आ रहा है, इसलिए तमाम आर्थिक परेशानियों के बावजूद वे इस पेशे से जुड़े हुए हैं।
🎨 मूर्तियां बनाने में लागत ज्यादा और मुनाफा कम, पिछले 22 सालों से इस काम में जुटे हैं मूर्तिकार रंजीत मंडल
बंगाल से आकर यहां मूर्ति कला को संवार रहे मूर्तिकार रंजीत मंडल ने बताया कि वे पिछले 22 वर्षों से लगातार मूर्तियां बनाने और बेचने का कार्य कर रहे हैं। साल भर वे अलग-अलग त्योहारों के हिसाब से प्रतिमाएं तैयार करते हैं। वे सबसे पहले गणेश चतुर्थी के लिए गणपति की प्रतिमा बनाते हैं, उसके बाद दुर्गा पूजा के लिए मां दुर्गा की मूर्तियां तैयार करते हैं और इसके पश्चात वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा के लिए प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। रंजीत ने बताया कि फिलहाल मूर्तियों पर पुट्टी का काम चल रहा है, जिस पर दो कोट पुट्टी की जाती है और उसके बाद सुंदर पेंटिंग तथा माता रानी का भव्य श्रृंगार व साज-सज्जा की जाती है। उन्होंने दर्द साझा करते हुए कहा कि महंगाई इतनी बढ़ गई है कि अब परिवार का भरण-पोषण करना और लेबर (श्रमिकों) तक का खर्च निकालना भी बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
📈 आसमान पर पहुंचे मूर्तियों के दाम, लोकल और बंगाल की मिट्टी से तैयार हो रही प्रतिमाएं
केरवाशीला गांव के रहने वाले एक अन्य मूर्तिकार दीपांकर ने बताया कि वे हर साल की तरह इस बार भी मां दुर्गा की आकर्षक मूर्तियां बना रहे हैं। लेकिन इस बार महंगाई इतनी ज्यादा है कि उन्हें अभी तक केवल तीन ही मूर्तियों के ऑर्डर मिल पाए हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने 30 हजार से लेकर 42 हजार रुपये तक की रेंज में मूर्तियां बनाकर रखी हैं। इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए स्थानीय मिट्टी के साथ-साथ विशेष रूप से बंगाल (कोलकाता) से लाई गई मिट्टी का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा मूर्तियों की सजावट के लिए कलकत्ता से आने वाला सामान इस बार काफी महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर उनकी लागत पर पड़ रहा है।
🏛️ पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है पुश्तैनी कारोबार, इसी आमदनी से चलता है साल भर का परिवार
रामानुजगंज और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इन मूर्तिकारों के परिवार कई पीढ़ियों से विभिन्न पूजा-पर्वों के अवसर पर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं बनाने के इस पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। मूर्ति कला से होने वाली इस मौसमी आमदनी पर ही उनके पूरे साल का जीवनयापन निर्भर करता है, हालांकि मौजूदा समय में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे ने उनके सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।


