बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद और तलाक से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल मौखिक आरोप लगा देने मात्र से तलाक की डिक्री हासिल नहीं की जा सकती। वैवाहिक क्रूरता (Mental Cruelty) और परित्याग (Desertion) जैसे गंभीर आधारों को साबित करने के लिए अदालत के सामने विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने पति की ओर से दायर तलाक संबंधी अपील को पूरी तरह से खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के पूर्व फैसले को सही ठहराया।
🚫 ‘पति को काला और मोटा कहना तलाक का पर्याप्त आधार नहीं’: खंडपीठ ने सुनाया फैसला
यह ऐतिहासिक फैसला न्यायमूर्ति पार्थ प्रीतम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की युगल पीठ (Division Bench) ने सुनाया।
मामले की सुनवाई के दौरान पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की मांग करते हुए अपनी पत्नी पर मानसिक प्रताड़ना, धमकी देने और बिना किसी वजह के मायके में रहने का आरोप लगाया था। पति का यह भी तर्क था कि पत्नी उसके रंग और शारीरिक बनावट पर टिप्पणी करते हुए उसे ‘काला’ और ‘मोटा’ कहकर अपमानित करती थी। हालांकि, अदालत ने माना कि बिना किसी मजबूत साक्ष्य के केवल ऐसे बयानों को ही शादी तोड़ने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
📜 फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार: पति के आरोपों में नहीं पाया गया दम
इससे पूर्व पारिवारिक न्यायालय ने भी दोनों पक्षों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद पति द्वारा लगाए गए आरोपों को प्रमाणित नहीं माना था।
फैमिली कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी भी आरोप की पुष्टि के लिए कानून के समक्ष ठोस प्रमाणों का होना अति आवश्यक है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद पीठ ने पाया कि वैवाहिक क्रूरता का आवश्यक कानूनी तत्व इस मामले में सिद्ध नहीं होता है।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट का दिया हवाला: मानसिक क्रूरता की कोई एक निश्चित कसौटी नहीं
हाईकोर्ट ने परित्याग (डेजर्टशन) के आरोप पर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल पति-पत्नी का अलग-अलग रहना अपने आप में परित्याग सिद्ध नहीं करता।
इसके लिए यह साबित करना होगा कि अलग रहने का कोई न्यायसंगत कारण नहीं था और वैवाहिक संबंधों को हमेशा के लिए समाप्त करने की नीयत थी। मानसिक क्रूरता के संदर्भ में खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध समर घोष बनाम जया घोष (2007 4 SCC 511) मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि मानसिक क्रूरता की कोई एक निश्चित कसौटी नहीं हो सकती, और प्रत्येक मामले का निस्तारण उसके विशिष्ट तथ्यों और ठोस सबूतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


