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    Home » भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक पितृपक्ष, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पावन पर्व

    भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक पितृपक्ष, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पावन पर्व

    August 19, 2026 धार्मिक 2 Mins Read
    festival of reverence for ancestors
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    सनातन धर्म में भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाले समय को ‘पितृपक्ष’ (श्राद्ध पक्ष) के रूप में जाना जाता है। यह कालखंड पितरों और पूर्वजों के प्रति आदर, कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए सबसे पवित्र माना गया है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के साथ तर्पण, पिंडदान (festival of reverence for ancestors) और श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं। श्राद्ध के दौरान ब्राह्मण भोज से पहले भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटियों के लिए निकाला जाता है, जिसे शास्त्रों में ‘पंचबलि’ कहा गया है।

     साल 2026 में कब से शुरू होगा पितृपक्ष? जानें सही तिथियां

    हिंदू पंचांग और द्रिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में पितृपक्ष की मुख्य तिथियां इस प्रकार हैं:

      • पितृपक्ष का प्रारंभ: 26 सितंबर 2026 (भाद्रपद पूर्णिमा / प्रतिपदा श्राद्ध)

      • पितृपक्ष का समापन: 10 अक्टूबर 2026 (सर्वपितृ अमावस्या)

      • धार्मिक महत्व: इन 16 दिनों में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार उनका विधिवत श्राद्ध और तर्पण करते हैं।

         

     पंचबलि का महत्व: श्राद्ध में जीवों को भोजन क्यों कराया जाता है?

    शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म केवल ब्राह्मणों को भोजन कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि (festival of reverence for ancestors) समस्त प्रकृति और जीवों के प्रति दायित्व निभाने का विधान है:

      • पंचबलि की परंपरा: भोजन का अंश पांच प्रमुख माध्यमों के लिए निकाला जाता है।

      • पितरों की तृप्ति का भाव: गरुड़ पुराण और अग्नि पुराण के अनुसार इन जीवों को कराया गया भोजन पितरों तक सूक्ष्म रूप में पहुंचता है और उनकी आत्मा को तृप्ति प्रदान करता है।

         

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