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    Home » Batwara 1947 Review: सालों बाद साथ आई सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी, नफरत के दौर में इंसानियत का आईना दिखाती है फिल्म

    Batwara 1947 Review: सालों बाद साथ आई सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी, नफरत के दौर में इंसानियत का आईना दिखाती है फिल्म

    August 14, 2026 मनोरंजन 5 Mins Read
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    सिनेमा डेस्क: जब भी भारतीय सिनेमा के पोस्टर पर अभिनेता सनी देओल और निर्देशक राजकुमार संतोषी का नाम एक साथ छपता है, तब 90 के दशक का वह दौर बरबस याद आ जाता है जब थिएटरों में ‘ढाई किलो का हाथ’, ‘तारीख पर तारीख’ और ‘बलि चढ़ाने वाले’ जैसे दमदार संवादों पर तालियों और सीटियों की गूंज थमने का नाम नहीं लेती थी।

    ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी ऐतिहासिक और कालजयी फिल्में देने वाली यह दिग्गज जोड़ी दशकों बाद पुनः एक साथ बड़े पर्दे पर लौटी है। ऐसे में हर दर्शक के मन में यह उत्सुकता स्वाभाविक है कि क्या यह वही पुराना फॉर्मूला है? किंतु ‘बंटवारा 1947’ कोई घिसी-पिटी बदले की आग या केवल चीख-पुकार वाली सतही देशभक्ति की कहानी नहीं है। यह 1947 के उस खूनी मंजर की मार्मिक दास्तान है, जहाँ मुल्क की सीमाएं तो बंट गईं, परंतु इंसानियत के सीने पर लगे गहरे जख्म आज भी इतिहास के पन्नों पर हरे हैं। असगर वजाहत के बहुचर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई देख्या ओ जम्या ई नई’ के ताने-बाने पर बुनी यह फिल्म सीधे दिल के सबसे संवेदनशील तारों को छूती है।

    📖 लाहौर की नफरत भरी गलियों में इंसानियत की जंग, जानिए क्या है फिल्म की मूल कहानी

    फिल्म का कथानक दर्शकों को 1947 के उस उथल-पुथल भरे दौर में ले जाता है, जब सत्ता के गलियारों में खींची गई विभाजन की लकीरों ने लाखों बेकसूर इंसानों की जिंदगियां तबाह कर दी थीं।

    यह कहानी है उस लाहौर शहर की, जिसके विषय में गर्व से कहा जाता था कि ‘जिसने लाहौर नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा’; किंतु सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका ने उसी हसीन शहर को नफरत का अखाड़ा बना दिया। कहानी का केंद्र हैं बुजुर्ग हिंदू महिला ‘माई’ (शबाना आजमी), जो भीषण दंगों, दहशत और अपनों के उजड़ जाने के बावजूद अपनी पुश्तैनी हवेली और अपनी मिट्टी को छोड़ने से साफ इनकार कर देती हैं। दूसरी तरफ लखनऊ से दंगों का दंश झेलकर लाहौर पहुँचा एक शरणार्थी मुस्लिम परिवार उसी हवेली में रहने आता है। जब मजहब की दीवारें आमने-सामने खड़ी होती हैं, तो संशय, भय और तनाव उत्पन्न होता है; किंतु इसी घनघोर अंधेरे में सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) का किरदार इंसानियत की मजबूत ढाल बनकर खड़ा होता है।

    🎥 राजकुमार संतोषी का मंझा हुआ निर्देशन और ए.आर. रहमान का असरदार बैकग्राउंड स्कोर

    निर्देशक राजकुमार संतोषी अपने जाने-पहचाने संजीदा तेवर के साथ लौटे हैं और उन्होंने एक ऐसे संवेदनशील ऐतिहासिक विषय को छुआ है, जिस पर काम करने का साहस बहुत कम फिल्मकार जुटा पाते हैं।

    1947 के दौर का लाहौर पर्दे पर जिस प्रमाणिकता के साथ पुनर्जीवित किया गया है, वह तनिक भी कृत्रिम प्रतीत नहीं होता। संकरी गलियां, जलते हुए मकान, आमजन की आंखों में पसरा खौफ और दंगों की घुटन दर्शक सिनेमाघर में सहज महसूस कर सकते हैं। संतोषी ने किसी एक पक्ष को सही या गलत ठहराने के बजाय दोनों तरफ के आम नागरिकों की पीड़ा को पूरी ईमानदारी से उभारा है। फिल्म का मध्यांतर पूर्व (फर्स्ट हाफ) का हिस्सा माहौल बनाने और किरदारों को स्थापित करने में थोड़ा धीमा जरूर लगता है, किंतु इंटरवल के बाद फिल्म जबरदस्त रफ्तार पकड़ती है। जब उन्मादी भीड़ शबाना आजमी पर झपटती है और सनी देओल का रौद्र रूप सामने आता है, तो दर्शक रोमांचित हो उठते हैं। वहीं संगीतकार ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के भावुक दृश्यों में जान फूंक देता है।

    🎭 सनी देओल का ठहराव भरा अंदाज और शबाना आजमी का भावुक अभिनय

    अभिनय के दृष्टिकोण से, सनी देओल ने अपने पारंपरिक ‘एंग्री मैन’ की छवि को तोड़ते हुए एक अत्यंत परिपक्व और संयमित अभिनय प्रस्तुत किया है।

    इस किरदार में वे गरजे कम और अपनी आंखों के गहरे दर्द व ठहराव से अधिक बोले हैं। जब वे शांत लहजे में संवाद अदायगी करते हैं, तो उनकी बातें दिल पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। थाने वाले दृश्य में उनका आक्रोश किसी दिखावे के बिना एक असहाय नागरिक की रक्षा के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। वहीं शबाना आजमी ने एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है कि उन्हें अभिनय का संस्थान क्यों कहा जाता है; चौखट से लिपटकर अपनी मिट्टी के प्रति उनका मोह दर्शकों की आंखें नम कर देता है। लंबे अरसे बाद बड़े पर्दे पर लौटीं प्रीति जिंटा ताजी हवा के झोंके जैसी लगती हैं, जबकि अभिमन्यु सिंह ने नकारात्मक शेड में सटीक कड़वाहट पेश की है। हालाँकि, करण देओल के अभिनय में अभी और निखार की आवश्यकता दिखती है तथा अली फजल जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता का किरदार काफी सीमित नजर आता है।

    ⚖️ क्यों देखें और क्या है अंतिम निष्कर्ष: समाज को आईना दिखाती एक ईमानदार सिनेमाई कोशिश

    यदि आप केवल बिना सिर-पैर का मसाला एक्शन, नाच-गाना अथवा उड़ती हुई गाड़ियां देखने के शौकीन हैं, तो शायद यह फिल्म आपकी पसंद न बने।

    किंतु यदि आप उस ऐतिहासिक विभीषिका के मानवीय दर्द को शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं, तो ‘बंटवारा 1947’ अवश्य देखी जानी चाहिए। आज के दौर में, जहाँ सोशल मीडिया पर नफरत की भाषा आसानी से देखने को मिलती है, यह फिल्म याद दिलाती है कि नफरत की आग में हमेशा घर आम बेकसूर इंसान का ही जलता है। कुल मिलाकर, ‘बंटवारा 1947’ केवल सनी देओल और राजकुमार संतोषी का कमबैक नहीं, बल्कि सिनेमा के माध्यम से समाज को आईना दिखाने का एक साहसिक और विचारोत्तेजक प्रयास है।

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