रांची (झारखंड): देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए ऐतिहासिक प्रदर्शनों की तर्ज पर इन दिनों झारखंड में भी हजारों प्रतियोगी छात्र सड़कों पर उतरकर आंदोलनरत हैं। तथापि, इस राज्यव्यापी छात्र आंदोलन को जंतर-मंतर वाले प्रदर्शनों से सर्वथा भिन्न एवं अनुशासित बताया जा रहा है। ऐसे में यह मूलभूत प्रश्न उपस्थित होता है कि आखिर दोनों छात्र आंदोलनों के मध्य क्या-क्या मुख्य अंतर हैं? इसके कई तकनीकी एवं व्यावहारिक पहलू हैं।
पहला पहलू यह है कि झारखंड के इस आंदोलन में जंतर-मंतर जैसा तीखा टकराव या अमर्यादित वातावरण दिखाई नहीं दे रहा है। यहाँ अब तक किसी भी चरण में गाली-गलौज, विद्वेष अथवा व्यक्तिगत छींटाकशी की भाषा देखने को नहीं मिली है, अपितु पूरे प्रदर्शन का केंद्र बिंदु केवल अपनी न्यायसंगत मांगों पर ही टिका हुआ है।
📜 न मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग, न सरकार गिराने की साजिश; केवल निष्पक्ष जांच और न्याय पर फोकस
इस आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें मुख्यमंत्री अथवा शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की कोई राजनीतिक मांग प्रस्तुत नहीं की गई है।
इसके विपरीत, छात्रों के इस आंदोलन का मुख्य ध्येय केवल परीक्षाओं में हुई कथित व्यापक धांधली की निष्पक्ष जांच, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्य अभ्यर्थियों के लिए न्याय सुनिश्चित कराना है। इसमें सत्ता परिवर्तन या किसी मंत्री विशेष को निशाना बनाने जैसा कोई छिपा हुआ एजेंडा शामिल नहीं है।
तीसरा पहलू भाषा का संयम और मांगों की सुस्पष्टता है। प्रदर्शनकारी अपनी बात उग्र या हिंसक नारों के स्थान पर ठोस बिंदुओं और अनुशासित तर्कों के साथ प्रशासनिक पटल पर रख रहे हैं, जिससे आंदोलन का स्वर अपेक्षाकृत संतुलित और गंभीर बना हुआ है।
🕊️ पूर्णतः शांतिपूर्ण रणनीति पर चल रहा है सत्याग्रह, नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी
झारखंड में अभ्यर्थियों की पूरी रणनीति पूर्णतः लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण है।
राजधानी में चल रहा यह धरना-प्रदर्शन अब तक पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से संचालित हो रहा है, जहाँ किसी भी प्रकार के उपद्रव, हिंसक झड़प या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ की कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। दिलचस्प बात यह है कि प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पुण्यतिथि को आदरपूर्वक याद कर रहे हैं और साथ ही हेमंत सोरेन सरकार की नीतियों व प्रशासनिक ढिलाई के विरुद्ध नारेबाजी भी कर रहे हैं। इससे यह सुस्पष्ट होता है कि छात्रों का विरोध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर केवल सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों से है।
🚫 मंच साझा करने से कतरा रहे राजनीतिक दल, छात्रों ने बनाए रखी अपनी स्वतंत्र पहचान
इस आंदोलन की एक और अनूठी विशेषता यह है कि प्रमुख राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता इससे स्पष्ट दूरी बनाए हुए हैं।
यद्यपि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के कतिपय नेताओं ने आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन अवश्य प्रदान किया है, परंतु अभ्यर्थियों के कड़े रुख के कारण अधिकांश राजनेता मंच साझा करने से कतरा रहे हैं। इस दूरी के कारण आंदोलन अपनी विशुद्ध ‘छात्र-केंद्रित’ और निष्पक्ष पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में पूर्णतः सफल सिद्ध हो रहा है।
💡 ‘ईगो’ नहीं बल्कि मौलिक मुद्दों की लड़ाई, सोशल मीडिया पिकनिक से दूर समाधान पर केंद्रित प्रयास
निष्कर्षतः, झारखंड का यह ऐतिहासिक आंदोलन किसी ‘ईगो’ या व्यक्तिगत साख की लड़ाई न होकर युवाओं के मौलिक अधिकारों और उज्ज्वल भविष्य की लड़ाई है।
इसमें शासन-प्रशासन के साथ वार्ता और तार्किक समाधान के द्वार हमेशा खुले रखे गए हैं, जिससे आंदोलन का रुख टकराव के बजाय समाधान की ओर अधिक झुका हुआ दिखता है। जंतर-मंतर के कई आंदोलनों के विपरीत, जहाँ प्रदर्शन स्थल एक समय के बाद ‘पिकनिक स्पॉट’ या सोशल मीडिया इवेंट जैसा प्रतीत होने लगता था, वैसा माहौल झारखंड में बिल्कुल नहीं है। यहाँ आने वाले प्रत्येक नागरिक और युवा का एकमात्र उद्देश्य सत्याग्रह में गंभीर भागीदारी निभाना है, जिससे इसे किसी भी प्रकार के मनोरंजन या गैर-जरूरी दिखावे से पूरी तरह मुक्त रखा जा सके।


