रांची/बोकारो : झारखंड के बोकारो जिले से जुड़े चर्चित 95.65 एकड़ वन भूमि घोटाले में राज्य अपराध अनुसंधान विभाग (CID) की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, चौंकाने वाले तथ्य उजागर हो रहे हैं। सीआईडी की विस्तृत जांच में सामने आया है कि सरकारी एवं संरक्षित वन भूमि को कूटरचित एवं फर्जी दस्तावेजों के सहारे निजी जमीन बताकर बेचा गया और करोड़ों रुपये की अवैध कमाई की गई। सीआईडी ने विशेष अदालत को अवगत कराया है कि यह कोई (forest land scam) सामान्य भूमि विवाद नहीं है, बल्कि वर्षों से सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत रची गई एक बड़ी संगठित साजिश है।
मुख्य साजिशकर्ता शैलेश कुमार सिंह की जमानत याचिका खारिज
झारखंड सीआईडी द्वारा दर्ज 95.65 एकड़ कथित वन भूमि हस्तांतरण और धोखाधड़ी मामले में रांची की सीआईडी विशेष अदालत ने आरोपी शैलेश कुमार सिंह की नियमित जमानत याचिका निरस्त कर दी है। अदालत ने सुनवाई के दौरान माना कि प्रथम दृष्टया शैलेश कुमार सिंह इस बहुचर्चित भूमि घोटाले के मुख्य सूत्रधार (forest land scam) और साजिशकर्ता प्रतीत होते हैं। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर संरक्षित वन भूमि को निजी कंपनी के नाम स्थानांतरित किया गया। चूंकि मामले की जांच वर्तमान में जारी है और आरोपों की प्रकृति अत्यधिक गंभीर है, अतः इस चरण में आरोपी को जमानत देने का कोई विधिक आधार नहीं बनता।
क्या है 95.65 एकड़ का बोकारो जमीन घोटाला?
जिस भूमि को लेकर यह पूरा प्रकरण केंद्रित है, वह बोकारो के मौजा तेतूलिया स्थित प्लॉट संख्या 426, 450 सहित कुल 95.65 एकड़ का भूभाग है। सीआईडी द्वारा अदालत को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, यह भूमि मूल रूप से रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (Record of Rights) में ‘जंगल-झाड़ी’ के रूप में दर्ज थी। वर्ष 1947 में इसे निजी संरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और बिहार भूमि सुधार कानून लागू होने के पश्चात यह भूमि राज्य सरकार में निहित हो गई। वर्ष 1958 में भारतीय वन अधिनियम के तहत इसे संरक्षित वन घोषित किया गया और 1962 में बोकारो स्टील प्लांट (BSL) को हस्तांतरित किया गया। BSL द्वारा उपयोग न किए जाने पर इसे औपचारिक रूप से वन विभाग को वापस किया जाना था, किंतु कागजी प्रक्रिया पूरी न होने का लाभ भू-माफियाओं ने उठाया।


