Chacha Shivpal on Akhilesh yadav : प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव ने नेता असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए उसके सहित अन्य छोटे दलों से गठबंधन करने का ऐलान कर भावी सियासत को संकेत दिया है। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि 2022 के विधानसभा चुनाव के मैदान में सपा का झंडा और उम्मीदवार कई सीटों पर रहने वाले है। अखिलेश के प्रस्ताव के अनुसार शिवपाल सिर्फ जसवंतनगर तक सीमित रहकर संतुष्ट होने वाले नहीं हैं।
सपा को लेकर उत्त्सुक नहीं है शिवपाल

Chacha Shivpal on Akhilesh yadav : दरअसल, शिवपाल यादव अध्यक्ष पार्टी सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर से मुलाकात और इसको लेकर बातचीत की स्वीकारोक्ति यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वे प्रदेश में अलग मोर्चे पर काम कर रहे है। अगर उन्हें सपा से ही मिलकर चुनाव लड़ना होता तो वह मोर्चा बनाने की कवायद में क्यों जुटते ? यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजभर और अखिलेश का साथ छूट चुका है, जबकि ओवैसी और अखिलेश लगातार एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। ऐसे में अगर शिवपाल इन नेताओं से बातचीत कर रहे हैं तो साफ है सपा को लेकर वो बहुत उत्सुक नहीं है। इसलिए वो अपनी ताकत बनाये रखते चाहते है।
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अखिलेश ने शिवपाल कैबिनेट में जगह देने की कही बात

Chacha Shivpal on Akhilesh yadav : भले ही सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने पिछले दिनों चाचा शिवपाल के लिए जसवंत नगर सीट छोड़ने और सरकार बनाने पर उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाने की बात कहकर सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का संकेत दिया था। लेकिन अब शिवपाल ने जिस तरह कहा कि अखिलेश का मुझे एक सीट या कैबिनेट मंत्री पद देना एक मजाक है|हम आगामी 21 दिसंबर को मेरठ में रैली कर यूपी विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक देंगे। उसके बाद गांवों में पदयात्रा करेंगे, इससे साफ है कि अखिलेश के प्रस्ताव पर उनका रुख सकारात्मक नहीं है। एक तरफ शिवपाल का यह बयान सपा से दूरी बनाकर चलने का संकेत ही है। उधर अखिलेश लगातार यह कह रहे हैं कि एक सीट और कैबिनट का पद देंगे और क्या चाहिए? मतलब अखिलेश भी चाचा शिवपाल को इससे ज्यादा नहीं देना चाहते हैं।
प्रसपा के बिना कोई मजबूत विकल्प और गठबंधन बनना मुश्किल
प्रसपा प्रवक्ता दीपक मिश्रा कहते हैं कि उनकी पार्टी भाजपा को रोकना और सभी पंथनिरपेक्ष तथा सांप्रदायिक दलों को साथ लेकर चलना चाहती है। कोशिश है कि पंथनिरपेक्ष और समाजवादी विचारधारा को मानने वाले सभी दल प्रसपा के साथ जुड़े और वे प्रदेश के में भाजपा के राजनीतिक विकल्प की धुरी बने, यह तथ्य भाजपा विरोधी किसी दल को नहीं भूलना चाहिए कि प्रसपा के बिना कोई मजबूत विकल्प और गठबंधन बनना मुश्किल है, रही बात प्रसपा की तो लोहियावादी सम्मान से समझौता नहीं करा सकते हैं।

