मुरैना (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से संघर्ष, धैर्य और कानूनी विजय की एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। सीआरपीएफ (CRPF) से बर्खास्त होने के बाद ढाई दशक तक संत का जीवन बिताने वाले गिरवर सिंह तोमर ने पूरे 26 साल बाद दोबारा खाकी वर्दी धारण की है।
नौकरी से निकाले जाने के बाद उन्होंने मंदिर में सेवा की, परिवार के दायित्व निभाए और साथ ही अपने आत्मसम्मान व हक के लिए अदालत में लंबी लड़ाई लड़ी। अंततः इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद उन्हें न्याय मिला और उनका खोया हुआ सम्मान वापस लौटा।
🛕 गुफा तपसी बाबा मंदिर में डेरा: ‘गिरवरदास महाराज’ बनकर की साधना और सेवा
संत जीवन और मंदिर का आश्रय:
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विवाद के बाद बर्खास्तगी: सीआरपीएफ में हवलदार पद पर सेवाएं दे रहे गिरवर सिंह की एक वरिष्ठ अधिकारी से बहस हो गई थी, जिसके बाद उन्हें सेवामुक्त कर दिया गया।
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मंदिर बने आशियाना: नौकरी छिनने के बाद वे मुरैना शहर के एमएस रोड स्थित प्रसिद्ध गुफा तपसी बाबा मंदिर पहुंचे और वहीं अपना बसेरा बना लिया।
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‘गिरवरदास महाराज’ नाम मिला: मुख्य पुजारी ने उनकी निष्ठा देखकर उन्हें ‘गिरवरदास महाराज’ का नाम दिया। वे मंदिर में नियमित पूजा-पाठ और सेवा करते रहे, लेकिन कभी भी अपने संवैधानिक और विधिक अधिकारों की लड़ाई से पीछे नहीं हटे।
👮 1991 में CRPF में चयन, 8 साल की सेवा के बाद 1999 में बर्खास्त
सेना का जुनून और करियर की शुरुआत:
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कड़ी मेहनत से चयन: मुरैना के छिछावली गांव निवासी गिरवर सिंह तोमर को बचपन से ही वर्दी पहनने का जुनून था। कठिन परिश्रम के बल पर वे वर्ष 1991 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में बतौर हवलदार चयनित हुए थे।
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अचानक बदला जीवन: लगभग 8 वर्ष तक निष्ठापूर्वक सेवा देने के बाद वर्ष 1999 में एक उच्चाधिकारी से उनका विवाद हो गया।
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21 अक्टूबर 1999 को निष्कासन: विभागीय जांच बैठाई गई और 21 अक्टूबर 1999 को उन्हें बल से बर्खास्त कर दिया गया, जिससे उनका करियर बीच में ही थम गया।
⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट में 26 साल लंबी कानूनी जंग: हार नहीं मानी
न्यायपालिका में सतत संघर्ष:
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छिछावली से कोर्ट तक का सफर: बर्खास्तगी के शुरुआती झटके के बाद उन्होंने छिछावली गांव के पास बारहद्वारी मंदिर में 4-5 साल बिताए और फिर तपसी बाबा मंदिर में रहकर कानूनी दांवपेच लड़े।
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पारिवारिक जिम्मेदारियां: उन्होंने साधु का जीवन जीते हुए भी अपने परिवार का भरण-पोषण जारी रखा और कोर्ट की तारीखों पर पैरवी करते रहे।
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26 साल बाद इंसाफ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए बर्खास्तगी आदेश को रद्द किया और उन्हें ससम्मान बहाल करने का मार्ग प्रशस्त किया।
📜 2007 में आया था पक्ष में फैसला, डबल बेंच से मिला दोबारा जॉइनिंग का आदेश
कानूनी प्रक्रिया और जॉइनिंग का संघर्ष:
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स्टे का रोड़ा: गिरवर सिंह ने वर्ष 1999 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वर्ष 2007 में एकल पीठ ने उनके पक्ष में निर्णय दिया, लेकिन विभाग ने उस पर स्टे ले लिया।
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डबल बेंच का सख्त निर्देश: इसके बाद गिरवर सिंह ने हाईकोर्ट की खंडपीठ (डबल बेंच) में अपील दायर की। अदालत ने विभाग को कड़ा आदेश देते हुए 3 माह के भीतर उन्हें पुनः सेवा में बहाल (री-जॉइन) कराने का निर्देश दिया।
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अवमानना नोटिस के बाद मिली बहाली: निर्धारित समय सीमा में आदेश का पालन न होने पर गिरवर सिंह ने अधिवक्ताओं के जरिए अवमानना नोटिस जारी कराए, जिसके बाद विभाग को झुकना पड़ा और 26 वर्ष के लंबे वनवास के बाद उन्हें पुनः सीआरपीएफ की वर्दी प्राप्त हुई।


