अखिलेश या योगी विधान सभा चुनाव में कौन आगे:
उत्तर प्रदेश में 2017 विधान सभा चुनाव में भाजपा का चेहरा योगी आदित्यनाथ नहीं थे, सरकार बनने पर भी योगी के साथ दो उप मुख्यमंत्री बनाये गए, जो की इस बात को दिखाने का काम कर रही है की, योगी के मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी अंतिम समय में निश्चित हुई, अब योगी उत्तर प्रदेश में भाजपा का चेहरा है, और उत्तर प्रदेश 2022 विधान सभा चुनाव उनके लिए नाक की लड़ाई होने वाली है,ऐसी स्थिति में उन पर ये दबाव है की वो 2017 के करिश्मे को बनाये रख सके, और वर्त्तमान हालत में सपा बसपा, भाजपा से कैसे मुक़ाबले में दिखेंगी, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी
90 के दशक में मंडल कमंडल की राजनति के बाद जातिगत और धर्म आधारित राजनीति उत्तर प्रदेश में हमेशा से हावी रही है, और आगामी विधान सभा चुनाव में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है, CM सिटी गोरखपुर के साथ UP की सभी सीटों पर चुनावी माहौल अपनी पार्टी के पक्ष में बनाने के लिए सभी पार्टियां एड़ी चोटी का ज़ोर लगाएंगी और ऐसे में मुख्यमंत्री और उनकी सीट पर बनने वाले समीकरण सभी का ध्यान आकर्षित करने वाले हैं.
जातिगत समीकरण
उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है, विधान परिषद् की खाली हुई 12 सीटों पर चुनाव में 11 सीटों पर भाजपा अपनी दावेदारी निश्चित कर रही है जीत संभावना भाजपा की बनी हुई है, जिसमें की सपा बसपा को इस बार नुकसान होता दिखाई दे रहा है, इस पर करंट न्यूज़ आपको पहले ही चुनाव विश्लेषण का ब्यौरा दे चुका है.
उत्तर प्रदेश विधान सभा 2022 चुनाव में सभी पार्टियाँ अभी से जातिगत समीकरण भिड़ाने में लग गयी है उत्तर प्रदेश में ब्रह्मण मतदाता का प्रतिशत 8 है, वही ठाकुर 5 और अन्य अगड़ी जातियां 3 प्रतिशत है.
इसमें अगर योगी की बात की जाये तो उनका गढ़ कही जाने वाली गोरखपुर के जातीय समीकरण में वहां पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या डेढ़ लाख है, जो की चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, मंदिर मुद्दे का हल देने के बाद से भाजपा ध्रुवीकरण पर बल न देते हुए विकास के अजेंडे पर ही आगे बढ़ना चाहेगी, सपा मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद रहती है उत्तर प्रदेश में, इस बार ये वोट बैंक किस तरफ खिसकेगा इस पर सभी की निगाहें होगी.
मुस्लिम वोट गोरखपुर में भाजपा के साथ नहीं रहा है, जो की आने वाले दिनों में नागरिकता कानून के विरोध से भाजपा के पाले में नहीं आता दिख रहा है, गोरखपुर की बात करे तो डेढ़ लाख मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश न करके भाजपा अपने पारम्परिक वोटबैंक पर केंद्रित रहना चाहेगी.
मुख्यमंत्री की सीट गोरखपुर का समीकरण
44 लाख की जनसँख्या वाले गोरखपुर में पर मुख्यमंत्री की सीट होने के चलते दबाव चुनाव के बहुत पहले से बना रहेगा और इसके साथ ही पूरे पूर्वांचल की सीटों पर पारम्परिक मतदाता से अधिक चुनावों से पहले बनने वाले माहौल पर बहुत कुछ निर्भर करेगा.
गोरखपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत जिले की 5 विधानसभा सीटें आती हैं। ये विधानसभा सीटें- कैम्पियरगंज, पिपराइच, गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण और सहजनवा विधानसभा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. अगर हम गोरखपुर जिले की बात करे तो गोरखपुर में 9 विधान सभा सीटें आती है, जिसमे की 8 सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है, और एक सीट पर बसपा काबिज़ है.
90 के दशक से गोरखपुर के मतदाता योगी आदित्यनाथ को अपना सांसद चुनती आयी है, योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी हफ्ते में उनके दो दिन आज भी गोरखपुर में बीतते है, जो की उनकी पूर्वांचल में भाजपा के वोटबैंक को मजबूत बनाये रखने की एक कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है. 1998 से लगातार पांच बार चुने जाने की वजह भी यही है की योगी अपनी सीट और गोरखपुर समेत पूरे पूर्वांचल पर अपनी पकड़ को कमज़ोर नहीं होने देना चाहते है, उनके फायर ब्रांड नेता की इमेज को भाजपा दूसरे राज्यों में भी भुनाती है, जिसका की परिणाम हैदराबाद निगम चुनावो में देखने को मिला.
गोरखपुर लोकसभा सीट में 5 विधानसभा क्षेत्रों के 19.5 लाख वोटर्स हैं। पुरुष मतदाता की संख्या 10,72,003 और महिला मतदाता संख्या 87,70,18 है. सपा MY यानि की मुस्लिम और यादव के जिस गणित से उत्तर प्रदेश में सरकार बनती रही है, उसमे आने वाले दिनों में समीकरण बदलने की सम्भावना है, जिसमे की असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी और आप दोनों ही मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए निगम चुनावो में भी अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. ओवैसी की पार्टी ने 403 सीटों पर लड़ने का एलान किया है, जो की अखिलेश के पारम्परिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकता है.
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अखिलेश यादव अपनी पारिवारिक कलह और उसके बाद गलत गठजोड़ के चलते, पिछले चुनावों में अपने द्वारा किये हुए काम दिखा कर वोट हासिल करने में पूरी तरह सफल नहीं हुए, राहुल गाँधी का साथ सबसे अधिक सपा को नुकसान कर गया, वही चाचा शिवपाल जो की अपनी अलग पार्टी बना चुके है, उनके चुनाव से पहले सपा में वापसी की सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है.
प्रदेश का गणित कहता है की जिस पार्टी ने 30 फीसदी वोट हासिल करे वो सत्ता हासिल करने में सफल होता है, इस हिसाब से सभी पार्टी छोटे वोट बैंक पर भी अपनी पकड़ बनाये रखना चाहेंगी.
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