हिंदू धर्म में पति-पत्नी के रिश्ते को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है. अक्सर कहा जाता है कि पत्नी पति की ‘अर्धांगिनी’ होती है, यानी उसके हर सुख-दुख और पुण्य की भागीदार. लेकिन क्या (Premanand Maharaj reveals deep secret) आपने कभी सोचा है कि पति के पुण्य का फल तो पत्नी को मिलता है, पर पत्नी के पुण्य का फल पति को क्यों नहीं मिलता?
Premanand Maharaj reveals deep secret – प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि विवाह के समय होने वाले ‘पाणिग्रहण’ संस्कार में ही इस व्यवस्था का आधार छिपा है. विवाह में पति का हाथ नीचे और पत्नी का हाथ ऊपर होता है. इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि पति यह संकल्प लेता है कि “आज से मैं आपका (पत्नी का) सारा भार और जिम्मेदारी लेता हूँ.” इसी समर्पण और जिम्मेदारी के कारण पत्नी को पति के आधे पुण्य का स्वतः ही अधिकारी मान लिया जाता है.
क्यों मिलता है पत्नी को पति के पुण्य का फल?
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, एक स्त्री अपना घर, परिवार और सर्वस्व त्याग कर पति के पास आती है. वह पति के जीवन को सुगम बनाने के लिए घर की व्यवस्था और सेवा करती है. जब पति कोई तीर्थ यात्रा, दान या धार्मिक अनुष्ठान करता है, तो उसके पीछे पत्नी का सहयोग और व्यवस्था होती है. शास्त्रानुसार, पति के द्वारा किए गए किसी भी शुभ कार्य का आधा फल पत्नी के खाते में अपने आप चला जाता है.
पत्नी का पुण्य पति को क्यों नहीं मिलता?
यहाँ महाराज जी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर बताया है. उन्होंने साफ किया कि यदि पति अधर्मी है या गलत रास्ते पर है, और पत्नी चुपचाप अपना जप-तप और भक्ति कर रही है, तो उस पुण्य का फल पति को नहीं मिलेगा. ऐसी स्थिति में पति अपनी दुर्गति को प्राप्त होगा, जबकि पत्नी का अपनी भक्ति के बल पर परम कल्याण होगा.


