उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां यूपी एटीएस (UPATS) ने लखनऊ को दहलाने की बड़ी आतंकी साजिश को नाकाम कर राज्य को बड़े रेल हादसे से बचा लिया, वहीं दूसरी ओर यूपी पुलिस के तंत्र के भीतर एक शर्मनाक लापरवाही का खुलासा हुआ है. बिजनौर पुलिस ने पिछले साल जिस आतंकी नेटवर्क को क्लीन चिट देकर केस बंद कर (inspector and co suspended) दिया था, उसी गैंग के गुर्गों ने अब लखनऊ में सिग्नल सिस्टम फेल कर तबाही मचाने की योजना बनाई थी.
यूपी एटीएस ने दो दिन पहले एक बड़े ऑपरेशन में मेरठ के साकिब उर्फ डेविल, अरबाब, गौतमबुद्धनगर के विकास उर्फ रौनक और लोकेश उर्फ पपला पंडित को लखनऊ से गिरफ्तार किया. ये चारों संदिग्ध लखनऊ रेलवे स्टेशन पर विस्फोट करने और सिग्नलिंग सिस्टम को ठप कर एक भीषण रेल दुर्घटना को अंजाम देने की फिराक में थे.
पूछताछ में सामने आया कि इस पूरे ऑपरेशन का मास्टरमाइंड दुबई में बैठा मेरठ का आकिब खान है. आकिब ही वह व्यक्ति है जिसने इंस्टाग्राम और टेलीग्राम के जरिए इन लड़कों का संपर्क पाकिस्तानी हैंडलर्स से कराया था. ताज्जुब की बात यह है कि इसी आकिब को बिजनौर पुलिस ने कुछ महीने पहले मासूम बताकर छोड़ दिया था.
मामले की जड़ नवंबर 2025 में हुए एक वीडियो कॉल में है. बिजनौर के सौफतपुर निवासी मैजुल, जो साउथ अफ्रीका में सैलून चलाता है, उसका एक वीडियो कॉल वायरल हुआ था. इस कॉल में दुबई में बैठा आकिब खान हाथ में AK-47 और हैंड ग्रेनेड लहराता नजर आ रहा था. बिजनौर पुलिस ने 23 नवंबर 2025 को आकिब और मैजुल के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की थी.
inspector and co suspended – केस की विवेचना नांगल सोती के तत्कालीन थानाध्यक्ष सतेंद्र सिंह मलिक को सौंपी गई. आरोप है कि दारोगा जी ने आरोपियों से सेटिंग कर ली. उन्होंने वीडियो कॉल पर ही आकिब का बयान लिया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि “AK-47 असल में एक प्लास्टिक का खिलौना है और हैंड ग्रेनेड परफ्यूम की एक शीशी है.” पुलिस ने आतंकी नेटवर्क की गहराई मापने के बजाय आरोपियों की बातों पर यकीन किया और फाइनल रिपोर्ट लगाकर केस बंद कर दिया.


