नई दिल्ली: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए आज का दिन ऐतिहासिक बन गया है। स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) द्वारा पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से विकसित विक्रम-I (Vikram-I) रॉकेट ने सफलतापूर्वक अंतरिक्ष तक पहुंचकर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। यह शानदार उपलब्धि इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट है। इस सफलता ने देश के निजी अंतरिक्ष उद्योग (India’s first private rocket Vikram-1) को वैश्विक मंच पर एक नई और मजबूत पहचान दिलाई है। इस ऐतिहासिक सफलता के केंद्र में पवन कुमार चंदाना हैं, जो एक IITian, पूर्व ISRO वैज्ञानिक और अब एक बेहद सफल उद्यमी हैं।
गणित में मिले थे 51 अंक, IIT खड़गपुर से की इंजीनियरिंग
पवन चंदाना की कहानी आज देश के लाखों युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गई है। कभी गणित में सिर्फ 51 अंक पाने वाले इस छात्र ने आज अपनी मेहनत से भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाई दी है। हैदराबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े पवन बचपन से ही मशीनों और तकनीक को समझने में गहरी रुचि रखते थे। शुरुआत में गणित उनका मजबूत विषय नहीं था, लेकिन उनकी जिज्ञासा और लगातार मेहनत ने धीरे-धीरे विज्ञान और गणित को ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना दिया। करीब दो दशक पहले उन्होंने आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) की कठिन प्रवेश परीक्षा अपने पहले ही प्रयास में पास कर ली थी।
ISRO में GSLV Mk III जैसे अहम प्रोजेक्ट्स पर किया काम
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उनका सबसे बड़ा सपना अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करने का था। इसी सपने के चलते उन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में सीधे कैंपस प्लेसमेंट के जरिए नौकरी मिल गई। इसरो में रहते हुए उन्होंने GSLV Mk III जैसे महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम किया। विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में छह वर्षों तक रॉकेट डिजाइन और विकास का अमूल्य अनुभव हासिल करने के दौरान ही उनके मन में यह विचार आया कि क्या भारत में निजी क्षेत्र भी विश्वस्तरीय रॉकेट बना सकता है?
2018 में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना, नहीं मानी हार
इसी क्रांतिकारी सोच के साथ साल 2018 में पवन ने अपने साथी इसरो इंजीनियर नागा भारथ डाका (Naga Bharath Daka) के साथ मिलकर स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की। शुरुआती दिनों में स्टार्टअप के लिए फंडिंग और निवेशकों का भरोसा जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन इस कंपनी ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे भारतीय निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना ली। विक्रम-I की इस अपार सफलता ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि (India’s first private rocket Vikram-1) भारतीय निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष प्रक्षेपण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर बड़ी-बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं।
