ग्वालियर: मध्य प्रदेश सरकार ने किताबों और यूनिफार्म जैसी स्कूली आवश्यकताओं में चल रही निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए सभी जिलों में पुस्तक मेले आयोजित कराये. जिनमें एक ही स्थान पर सभी स्कूलों की किताबें पुस्तक विक्रेताओं को उपलब्ध करानी थी. ग्वालियर में भी जिला कलेक्टर की पहल पर व्यापार मेला परिसर में ही बुक फेयर लगवाया. लेकिन जब ईटीवी भारत ने इस बुक फेयर का रियलिटी चेक किया तो सरकार की मंशा यहां पूरी तरह ध्वस्त नजर आई.
रियलिटी चेक में लोगों ने बतायी परेशानी
ईटीवी भारत ने रियलिटी चेक में पाया कि, यहां स्कूली किताबों पर 10 प्रतिशत डिस्काउंट तो दिया जा रहा है, लेकिन कोर्स में शामिल एनसीईआरटी की किताबों पर कोई डिस्काउंट नहीं दिया जा रहा है. वहीं लोगों का मानना है यहां मिलने वाला डिस्काउंट राहत नहीं दे रहा. क्योंकि लिस्ट में तो हर स्कूल की किताबें लेने किए मेले में दो से तीन वेंडर्स के नाम दिए गए हैं. लेकिन किताबें मिल उसी एक वेंडर पर रहीं हैं जिनका गठबंधन स्कूलों से है. दूसरे-तीसरे वेंडर पर पालकों को किताबें उपलब्ध नहीं मिली.
एनसीईआरटी की किताबों पर नहीं मिला डिस्काउंट
मेले में अपने बच्चों के लिए स्कूल की किताबें और स्टेशनरी लेने आई मनीषा शर्मा का कहना था कि, इस मेले में आने का ज़्यादा कुछ फ़ायदा नहीं है. यहां सिर्फ 10 प्रतिशत ही डिस्काउंट दिया जा रहा है. इतने में क्या होता है, जबकि किताबें बहुत महंगी हैं. ऊपर से एनसीईआरटी की किताबों पर तो कोई भी डिस्काउंट नहीं दिया जा रहा है. जबकि ग्वालियर के विक्टोरिया मार्केट में एनसीईआरटी बुक्स पर भी डिस्काउंट मिलता है. यहां भी एक ही वेंडर से किताबे लेना पड़ रही हैं. ऐसे में यहां तक आने का फ़ायदा नहीं मिला. समय भी ख़राब हुआ और पेट्रोल का खर्चा अलग हुआ.”
‘200 रुपये का मिला डिस्काउंट इससे ज़्यादा यहां आने में खर्च’
एक अन्य पेरेंट सरिता का कहना है कि, ”प्रशासन ने भले ही ग्वालियर में बुक फेयर लगवा दिया है, लेकिन यहां भी एक ही वेंडर जो पहले से ही स्कूल द्वारा निर्धारित है उसी पर किताबें मिल रही हैं. उसके अलवा किसी पर नहीं मिलती. यूकेजी कक्षा की किताबें लगभग 3000 हज़ार रुपये की हैं, लेकिन उन्हें 2800 रुपये चुकाने पड़े. इससे क्या फ़ायदा हुआ, इस 200 रुपये के डिसकाउंट से ज़्यादा रुपये तो पुस्तक मेला आने में खर्च हो गए.”
‘बाज़ार में दुकाने बंद, इसलिए पुस्तक मेले से खरीदना मजबूरी’
पुस्तक मेले में अपने दो बच्चों की तीसरी और चौथी कक्षा की स्कूली किताबें खरीदने पहुंचे डॉ. मुकेश तोमर ने भी बताया कि, ”वे जब बुक फेयर में आए तो 5 से 6 दुकानों पर तलाशने के बाद भी उन्हें किताबें नहीं मिली आख़िर में उसी वेंडर के पास जाना पड़ा जिस पर हर बार स्कूल भेजता है. पुस्तक मेले के लिए जिला प्रशासन ने बाजार में मौजूद दुकान को बंद करा रखा है उनका काउंटर यहां मेले में लगा है इसलिए यहीं से लेना पड़ रही हैं.”
ग्वालियर के कपिल गोयल का कहना है कि, ”इस बुक फेयर का कोई फ़ायदा नहीं बल्कि अपना समय बर्बाद करना है. क्योंकि अगर यहां के बाद दो 200 रुपये के डिस्काउंट के लिए घंटे का समय बर्बाद हो रहे हैं तो नहीं लगता यहां आने का कोई फ़ायदा हुआ. यहां आने के बाद स्कूल लिस्ट में किताबों की खरीद के लिए दो वेंडर दर्शाए गए थे लेकिन जब पहले वेंडर पर पहुंचे तो वहां काफ़ी भीड़ लगी थी. इसलिए दूसरे वेंडर के काउंटर पर गए लेकिन उसके पास कितांबे उपलब्ध नहीं थी. यहां तक आए थे तो मजबूरी में उस एक मात्र वेंडर से किताबें लेना पड़ी जिसके पास किताबें मिल रही हैं. बुक फेयर में वेंडर की लिस्टिंग सिर्फ नाम के लिए है, क्योंकि किताबे सिर्फ एक जी वेंडर के पास मिल रही हैं.”
बहरहाल इन हालातों पर प्रशासन का पक्ष जाने के लिए हमने जिला शिक्षा अधिकारी हरिओम त्रिवेदी से संपर्क किया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका. ऐसे जब शिक्षा विभाग ने भी इस बुक फेयर में विभागीय कर्मचारियों को व्यवस्था में तैनात किया तब इस तरह की धांधली और पालकों को हो रही परेशानी जिम्मेदारों को नजर ना आना इस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है.
