कई दशकों से पाकिस्तान सिंधु जल संधि के तहत भारत पर अपनी पानी की सप्लाई रोकने का आरोप लगाता रहा है। उनके राजनेताओं, कमेंटेटरों और मीडिया आउटलेट्स द्वारा अक्सर बढ़-चढ़ाकर पेश की जाने वाली (Pakistan Water Crisis) यह बात भारत को एक ऐसे ‘ऊपरी हिस्से वाले देश’ के तौर पर दिखाती है, जो कभी भी “पानी बंद” कर सकता है। लेकिन, तथ्यों को करीब से देखने पर एक अलग ही कहानी सामने आती है। हकीकत यह है पाकिस्तान में पानी की कमी भारत की वजह से नहीं, बल्कि जल संसाधनों के खराब मैनेजमेंट की वजह से है।
1960 में हुई सिंधु जल संधि (IWT) के तहत, तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) का अधिकार भारत को दिया गया, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) के बेरोकटोक इस्तेमाल की गारंटी दी गई। भारत ने काफी हद तक अपनी जिम्मेदारियों का पालन किया है। रिसर्च से पता चलता है कि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों से हर साल लगभग 140 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी मिलता है, जो संधि के समय अनुमानित 135 MAF से थोड़ा ज्यादा ही है। पूर्वी नदियों में पानी का बहाव भले ही लगभग 15% कम हुआ हो, फिर भी यह पाकिस्तान के लिए काफी ज्यादा है।
बढ़ती मांग और सिंचाई के पुराने तरीके बढ़ा रहे जल संकट
1950 के दशक में पाकिस्तान 66 MAF पानी का इस्तेमाल करके 21 मिलियन एकड़ जमीन की सिंचाई करता था। आज वह 104 MAF पानी से 34 मिलियन एकड़ जमीन की सिंचाई करता है। सिंचाई वाला इलाका तो बढ़ा है, लेकिन प्रति एकड़ पानी का इस्तेमाल वैसा ही बना हुआ है। आबादी बढ़ने से प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता कम हो गई है, और पुराने तरीकों की वजह से पाकिस्तान आधुनिक जरूरतों को पूरा करने में संघर्ष कर रहा है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में हुआ खराब मैनेजमेंट का खुलासा
विश्व बैंक की 2018 की एक स्टडी ‘पाकिस्तान: गेटिंग मोर फ्रॉम वॉटर’ में यह निष्कर्ष निकाला गया कि पाकिस्तान के पास पानी के भरपूर संसाधन हैं, लेकिन खराब गवर्नेंस की वजह से वह अपनी ही जल सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है। रिपोर्ट में पानी के डेटा मैनेजमेंट में कमी, ग्राउंडवाटर का बहुत ज्यादा इस्तेमाल, फसल के लिए पानी की कम प्रोडक्टिविटी, बड़े (Pakistan Water Crisis) पैमाने पर प्रदूषण और बाढ़-सूखे की भविष्यवाणी में कमी जैसी कमियों को उजागर किया गया था।
