नई दिल्ली: देश में रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति को किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट या भू-राजनीतिक तनाव से सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार ने एक मजबूत और स्थायी तंत्र तैयार किया है।

पश्चिम एशिया में उपजे संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मार्ग के बाधित होने के दौरान भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता की चुनौती सामने आई थी। इस कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पहली बार देश की 21 रिफाइनरियों और अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए एलपीजी उत्पादन की अधिकतम क्षमता व लक्ष्य निर्धारित किया है। इन कंपनियों को मिलाकर कुल 63,810 टन प्रतिदिन एलपीजी उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है, जो देश की लगभग 91,000 टन दैनिक खपत का करीब 70 प्रतिशत है। इससे भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान सरकार के पास घरेलू स्तर पर पर्याप्त बफर मौजूद रहेगा। यह कोई अस्थायी आपातकालीन व्यवस्था नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और नियमित अपडेट होने वाला ढांचा होगा।

📉 64% आयात पर निर्भरता और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संकट

वित्त वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल वार्षिक एलपीजी खपत करीब 3.32 करोड़ टन (लगभग 91,000 टन प्रतिदिन) दर्ज की गई।

इसमें से देश के भीतर केवल 1.31 करोड़ टन (करीब 35,900 टन प्रतिदिन) का उत्पादन हुआ, जबकि शेष 2.13 करोड़ टन (करीब 58,400 टन प्रतिदिन) एलपीजी विदेशों से आयात करनी पड़ी। यानी भारत अपनी 64 फीसदी से अधिक एलपीजी जरूरतों के लिए सीधे तौर पर आयात पर निर्भर था। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात सऊदी अरब और खाड़ी देशों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जलमार्ग से करता है। ईरान-इजरायल संघर्ष के समय इस मार्ग पर खतरा मंडराते ही आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई थी, जिसके बाद सरकार ने घरेलू उत्पादन क्षमता को व्यवस्थित करने की यह व्यापक नीति तैयार की।

⚠️ मार्च में लगी थीं आपातकालीन पाबंदियां, अब बना स्थायी समाधान

संकट के चरम दौर में मार्च के दौरान सरकार ने रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल उत्पादन की स्ट्रीम को एलपीजी उत्पादन की तरफ मोड़ने के निर्देश दिए थे।

उस समय व्यावसायिक व औद्योगिक उपभोक्ताओं की आपूर्ति सीमित की गई थी, घरेलू सिलेंडर बुकिंग का अंतराल बढ़ाया गया था और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के उपयोग को बढ़ावा दिया गया था। तब आपातकालीन प्रयासों से घरेलू उत्पादन 55,000 टन प्रतिदिन तक पहुंचाया गया था। जून के मध्य में स्थिति सामान्य होने पर ये पाबंदियां हटा ली गई थीं, किंतु अब सरकार ने उससे आगे बढ़कर सभी कंपनियों के लिए एक स्थायी उत्पादन कोटा निर्धारित कर दिया है जिसे जरूरत पड़ते ही तत्काल प्रभावी किया जा सकेगा।

📊 किस कंपनी को मिला कितना उत्पादन टारगेट?

नए विनियामक आदेश के अनुसार, 21 कंपनियों की कुल क्षमता 63,810 टन प्रतिदिन तय की गई है:

  • सार्वजनिक क्षेत्र (PSU): सरकारी तेल कंपनियों की 18 रिफाइनरियों को मिलाकर कुल 31,470 टन प्रतिदिन का संयुक्त टारगेट दिया गया है।

  • रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL): जामनगर स्थित रिलायंस की घरेलू टैरिफ एरिया (DTA) रिफाइनरी को सबसे बड़ा व्यक्तिगत हिस्सा यानी 18,000 टन प्रतिदिन का जिम्मा मिला है। (एक्सपोर्ट-ओनली यूनिट को इससे अलग रखा गया है)।

  • नायरा एनर्जी: रूस की रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी को 4,480 टन प्रतिदिन का कोटा सौंपा गया है।

  • अपस्ट्रीम कंपनियां (ONGC & GAIL): प्राकृतिक गैस से एलपीजी निकालने वाली ओएनजीसी और गेल जैसी अपस्ट्रीम कंपनियों को मिलाकर 6,460 टन प्रतिदिन का टारगेट तय किया गया है।

⚙️ कंपनियों के लिए अनिवार्य कदम: इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी अपग्रेडेशन

मंत्रालय के निर्देशानुसार सभी सार्वजनिक, संयुक्त उपक्रम (JV) और निजी रिफाइनिंग कंपनियों को एलपीजी के भंडारण (Storage), निकासी (Evacuation) और रेल-रोड टैंकर आधारित परिवहन तंत्र को चाक-चौबंद करना होगा।

कंपनियों को नाफ्था को एलपीजी में बदलने और गैसोलीन आधारित इकाइयों को पेट्रो-फ्लुइड कैटेलिटिक क्रैकिंग (PFCC) यूनिट्स में अपग्रेड करने जैसे व्यावहारिक तकनीकी कदम उठाने होंगे तथा इसकी नियमित प्रगति रिपोर्ट ‘सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी’ (CHT) को सौंपनी होगी।

🔄 हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को अपडेट होगा शेड्यूल

सरकार ने आवश्यकता पड़ने पर उत्पादन मात्रा और समय-सीमा में तत्काल संशोधन करने का वैधानिक अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा है।

इस व्यवस्था को समयानुकूल बनाए रखने के लिए हर वर्ष 1 जनवरी और 1 जुलाई को प्रोडक्शन शेड्यूल को तकनीकी रूप से अपडेट किया जाएगा, ताकि नई चालू होने वाली रिफाइनरियों और विस्तारित क्षमताओं को इसमें समाहित किया जा सके। इस कदम से भारत वैश्विक ऊर्जा संकटों के बीच अपनी रसोई गैस आपूर्ति को पूरी तरह आत्मनिर्भर और निर्बाध बनाए रखने में सक्षम होगा।

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