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    Home » भाड़ में जाए सिलेंडर! इस गांव ने LPG की किल्लत के बीच ढूंढ लिया ‘देसी जुगाड़’; गोबर गैस से जल रहे चूल्हे, महीने भर की बचत जान रह जाएंगे दंग

    भाड़ में जाए सिलेंडर! इस गांव ने LPG की किल्लत के बीच ढूंढ लिया ‘देसी जुगाड़’; गोबर गैस से जल रहे चूल्हे, महीने भर की बचत जान रह जाएंगे दंग

    March 15, 2026 उत्तर प्रदेश 3 Mins Read
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    पूरे देश में इन दिनों जहां घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर को लेकर लोगों को लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा है और सिलेंडर की किल्लत को लेकर परेशानियां सामने आ रही हैं. वहीं औरैया जिले के भाग्यनगर ब्लॉक का परवाहा गांव इन समस्याओं से पूरी तरह दूर नजर आ रहा है. इस गांव के लोग पिछले करीब 10 वर्षों से गोबर गैस के संयंत्रों के जरिए अपने घरों में भोजन पका रहे हैं और एलपीजी सिलेंडर पर होने वाला खर्च भी बचा रहे हैं.

    भाग्यनगर ब्लॉक के परवाहा गांव में करीब 60 परिवार रहते हैं. इनमें से 30 से अधिक घरों में गोबर गैस के संयंत्र स्थापित हैं. गांव में अधिकांश परिवार पशुपालन से जुड़े हुए हैं और उनके पास कई मवेशी हैं. इन्हीं मवेशियों के गोबर का उपयोग कर ग्रामीण गोबर गैस तैयार करते हैं और उसी गैस से अपने घरों की रसोई चलाते हैं.

    गांव के लगभग हर घर के बाहर गोबर गैस का संयंत्र लगाया गया है. इन संयंत्रों से पाइपलाइन के जरिए गैस सीधे रसोईघर तक पहुंचाई गई है, जिससे ग्रामीणों को चूल्हा या सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती. सुबह और शाम ग्रामीण मवेशियों के गोबर में पानी मिलाकर संयंत्र में डालते हैं, जिससे गैस तैयार होती है और उसी गैस से दोनों समय का भोजन पकाया जाता है.

    गोबर से जल रहा चूल्हा

    गोबर गैस संयंत्रों के कारण जहां ग्रामीणों का रसोई गैस पर होने वाला खर्च लगभग शून्य हो गया है. वहीं इससे निकलने वाला अवशेष गोबर किसानों के लिए कंपोस्ट खाद के रूप में भी बेहद उपयोगी साबित हो रहा है. किसान इस खाद का उपयोग अपने खेतों में करते हैं, जिससे खेती की लागत भी कम हो रही है और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ रही है. इस समय जब कई जगहों पर एलपीजी सिलेंडर को लेकर अफरातफरी और भागदौड़ का माहौल है, तब परवाहा गांव के लोग खुद को पूरी तरह चिंता मुक्त महसूस कर रहे हैं.

    ग्रामीणों ने क्या कहा?

    ग्रामीण महिला रामसखी बताती हैं कि शुरुआती दौर में उन्होंने गैस सिलेंडर का कनेक्शन लिया था, लेकिन जब से गांव में गोबर गैस का संयंत्र बन गया, तब से सिलेंडर खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ी. केवल बड़े आयोजनों या मेहमानों के आने पर ही सिलेंडर का उपयोग करना पड़ता है, जिससे हर महीने होने वाला खर्च भी बच रहा है.

    वहीं ग्रामीण रामआसरे बताते हैं कि करीब दस साल पहले कृषि विज्ञान केंद्र ग्वारी की ओर से वैज्ञानिक गांव में आए थे. उनकी देखरेख में ग्रामीणों को गोबर गैस संयंत्र लगाने की जानकारी दी गई और संयंत्र स्थापित कराए गए. तभी से गांव के लोग इन संयंत्रों का उपयोग कर रहे हैं.

    गैस संकट के बीच मिशाल बना

    परवाहा गांव के लोग गोबर गैस के जरिए न सिर्फ एलपीजी संकट से दूर हैं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खेती की दिशा में भी एक मिसाल पेश कर रहे हैं. यह गांव ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक ऊर्जा के सफल मॉडल के रूप में सामने आ रहा है.

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