मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक केस की सुनवाई के दौरान जज ने सरकारी वकील से कहा कि अब इस केस में और समय नहीं लगना चाहिए. यह मामला तो हमारी और आपकी उम्र से भी पुराना हो गया है. कोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो अगली सुनवाई में श्योपुर के पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से पेश होना (long legal battle) पड़ेगा. कोर्ट ने केस की सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग की ढिलाई पर भी नाराजगी जाहिर की.
5 दशकों तक लड़ी अपने हक की लड़ाई
दरअसल, श्योपुर जिले की 79 वर्षीय मिथलेश श्रीवास्तव पिछले पांच दशकों से अपने दिवंगत पति की पेंशन और सेवा लाभ पाने के लिए अदालतों के चक्कर काट रही हैं. उनके पति शंकरलाल श्रीवास्तव मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर कार्यरत थे. उन्होंने 23 वर्ष की सेवा के बाद नवंबर 1971 में स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था. करीब 14 साल बाद वर्ष 1985 में उनका निधन हो गया. तभी से उनकी पत्नी मिथलेश अपने हक की पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य रिटायरमेंट लाभों के लिए संघर्ष कर रही हैं.
सिर्फ 33 रुपए अकाउंट में आ रही पेंशन
मामले की शुरुआत सिविल कोर्ट से हुई थी, जहां उन्होंने न्याय पाने के लिए याचिका दायर की. लंबे इंतजार के बाद 13 अगस्त 2005 को अदालत ने मिथलेश के पक्ष में निर्णय सुनाया और पुलिस विभाग को भुगतान करने के निर्देश दिए, लेकिन आदेश के बावजूद उन्हें पूरा लाभ आज तक नहीं मिला. जब विभाग ने कार्रवाई नहीं की तो उन्होंने फिर (long legal battle) से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इतने वर्षों के संघर्ष के बाद भी मिथलेश को अब तक सिर्फ 33 रुपए प्रति माह की प्रोविजनल पेंशन मिल रही है, जो न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही को उजागर करती है.

