भोपाल। गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा जैसे पावन पर्व हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अहम हिस्सा हैं। प्रतिमाओं का विसर्जन भी इसी आस्था से जुड़ी पवित्र परंपरा है। लेकिन जब भोपाल जैसे बड़े शहर में हजारों प्रतिमाएं कुछ ही घंटों और दिनों के भीतर विसर्जित होती हैं, तो उत्सव के बाद स्थानीय झीलों और तालाबों पर इसका पर्यावरणीय खतरा तेजी से बढ़ता है। भोपाल नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार बीते साल गणेश विसर्जन के दौरान 37,649 प्रतिमाएं (36,651 छोटी और 998 बड़ी) निर्धारित घाटों पर विसर्जित की गई थीं। अनुमान है कि इस बार यह संख्या 40 हजार के पार पहुँच सकती है।
🌸 केवल प्रतिमाएं ही नहीं, निर्माल्य भी बड़ी चुनौती: सफाई के दौरान निकला 50 टन से ज्यादा पूजा कचरा
बीते वर्ष भोपाल में गणेश विसर्जन के लिए 8 स्थायी घाटों के साथ 33 अस्थायी विसर्जन स्थल (कुल 41 स्थान) बनाए गए थे।
लेकिन विसर्जन के बाद केवल मूर्तियों के अवशेष ही चुनौती नहीं होते, बल्कि साथ में निकलने वाली निर्माल्य सामग्री भी एक विकराल समस्या बनती है। वर्ष 2025 में नगर निगम भोपाल द्वारा चलाए गए सफाई अभियान के दौरान 50 टन से ज्यादा पूजा सामग्री और कचरा इकट्ठा किया गया था। इसमें 28-30 टन फूल-मालाएं, 8-10 टन नारियल, 2 टन कपड़े, 800 किलो सजावटी सामान-प्लास्टिक, 100 किलो कांच व फोटो फ्रेम और लगभग 500 किलो खाद्य सामग्री शामिल थी।
🧪 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में खुलासा: पानी में पाई गईं जिंक, क्रोमियम और सीसा जैसी भारी धातुएं
प्रतिमा विसर्जन के साथ बहने वाले सिंथेटिक रंग और निर्माण सामग्री पानी के रासायनिक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।
प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी प्रतिमाएं प्राकृतिक मिट्टी की तरह पानी में आसानी से घुलनशील नहीं होती हैं। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की निगरानी जांच में विसर्जन के बाद भोपाल के प्रमुख जलाशयों के पानी में जिंक, क्रोमियम, तांबा, सीसा (Lead), कैडमियम और कोबाल्ट जैसी विषैली भारी धातुएं (Heavy Metals) पाई गई हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं।
🐟 जलीय पारिस्थितिकी और जीवों पर संकट: घट रही है ऑक्सीजन की मात्रा
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जब जलाशयों में जैविक कचरा और रासायनिक सामग्री पहुंचती है, तो पानी में घुलनशील ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर तेजी से गिरता है।
वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पांडे का कहना है, “जलीय जीव केवल पानी की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को संतुलित रखते हैं। यदि भारी धातुएं और रसायन लंबे समय तक पानी में बने रहते हैं, तो मछलियों और अन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। इसलिए विसर्जन के बाद जल की गुणवत्ता की नियमित जांच बेहद जरूरी है।”
📜 16 वर्षों से लागू हैं गाइडलाइंस: अब निर्माण स्तर पर कड़ी निगरानी की आवश्यकता
डॉ. पांडे बताते हैं कि जलाशयों को बचाने के लिए दायर एक याचिका के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने वर्ष 2010 में प्रतिमा विसर्जन को लेकर पहली विस्तृत गाइडलाइन जारी की थी, जिसे 2020 में संशोधित किया गया।
इसमें केवल प्राकृतिक मिट्टी व प्राकृतिक रंगों का उपयोग करने, पीओपी व प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने और कृत्रिम टैंकों (Artificial Ponds) में विसर्जन करने के स्पष्ट निर्देश हैं। डॉ. पांडे का तर्क है कि निगरानी केवल विसर्जन के दिन नहीं होनी चाहिए, बल्कि मूर्तियां बनाते समय ही कार्यशालाओं में चेकिंग होनी चाहिए ताकि दूषित सामग्री के इस्तेमाल पर रोक लग सके।
🏭 सिर्फ विसर्जन ही अकेला जिम्मेदार नहीं: पहले से प्रदूषित झीलों पर बढ़ता है अतिरिक्त भार
मामले का एक अन्य व्यावहारिक पहलू यह भी है कि भोपाल के कई बड़े तालाब और झीलें पूरे साल सीवेज, प्लास्टिक और अन्य शहरी कचरे के दबाव में रहते हैं।
ऐसे में भारी धातुएं मिलने का एकमात्र कारण केवल मूर्ति विसर्जन नहीं है, लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि उत्सव के दौरान उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त प्रदूषण को अनदेखा कर दिया जाए। जब किसी जलाशय पर पहले से ही सीवेज का भार हो, तब उत्सव के दौरान पहुंचने वाला अतिरिक्त जैविक कचरा, पीओपी और रासायनिक रंग समस्या को कई गुना बढ़ा देते हैं।


