छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा जिले के छोटे-छोटे गांवों में इन दिनों सैकड़ों लोगों की मौजूदगी के बीच मिट्टी के अखाड़े सजाए जा रहे हैं।गणेश उत्सव के समापन के बाद ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक दंगल (कुश्ती) का दौर शुरू हो जाता है। इन आयोजनों में दूर-दूर से पहलवान अपने देशी दांव-पेच आजमाने पहुंचते हैं। अपनी उत्कृष्ट कला, स्टेमिना और शानदार बॉडी बिल्डिंग के दम पर जीत दर्ज करने वाले पहलवानों को ग्रामीणों द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत किया जाता है।
🏋️ शहरों में जिम, तो गांवों में अखाड़ा परंपरा: लाठी और लकड़ी के औजारों से पसीना बहाते हैं युवा
शहरों में लोग भले ही मॉडर्न जिम और फिटनेस सेंटरों में घंटों पसीना बहाकर अपनी बॉडी मेंटेन करते हों, लेकिन गांवों में यह कसरत परंपरा सदियों पुरानी है।
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में ‘अखाड़ा’ संस्कृति पूरे उत्साह के साथ जीवंत है। भले ही यहां आधुनिक उपकरण न हों, लेकिन पारंपरिक लाठी, भाला और लकड़ी के भारी औजार ही पहलवानों के व्यायाम का मुख्य साधन होते हैं। मानसून के दौरान इन अखाड़ों में युवा पहलवानों को कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है, जिसके बाद गणेश उत्सव समाप्त होते ही वे गांव-गांव में लगने वाले दंगलों में अपने हुनर का प्रदर्शन करते हैं।
🪵 15 फीट का भुरभुरी मिट्टी का गोला: व्यायामशाला से निकलकर अखाड़े में उतरते हैं पहलवान
अखाड़े में ट्रेनिंग देने वाले वरिष्ठ पहलवान नकल चंद्रवंशी ने बताया कि, “दंगल की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।
गांव के लोग जब खेती-किसानी के मुख्य कामों से निवृत्त हो जाते हैं, तो बारिश के दिनों में लकड़ी के पारंपरिक औजारों से कसरत करते हैं। इन स्थानों को ‘व्यायामशाला’ कहा जाता है। यहां जब पहलवान पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो गणेश उत्सव के बाद गांव के मैदान में करीब 15 फीट का एक गोला बनाकर उसमें भुरभुरी मिट्टी डाली जाती है, जहां ये पहलवान अपनी कुश्ती कला का जलवा बिखेरते हैं।”
🏅 ओलंपिक तक पहुंची मिट्टी के अखाड़े की धमक: बेटियां भी देश-विदेश में लहरा रहीं परचम
छिंदवाड़ा स्थित बड़ी माता व्यायामशाला के उस्ताद कस्तूरचंद जैन ने बताया कि, “कुश्ती हमारी मिट्टी से जुड़ी विशुद्ध देशी परंपरा है, जिसे अब ओलंपिक जैसे वैश्विक मंच पर भी पहचान मिल चुकी है।
अब केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि बेटियां भी कुश्ती के मैदान में अपना परचम लहरा रही हैं। छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ की अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवान शिवानी पवार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जिन्होंने देश और विदेश में कुश्ती में पदक जीतकर जिले का नाम रोशन किया है। शिवानी ने भी अपनी कुश्ती की शुरुआती बारीकियां गांव के इन्हीं दंगल-अखाड़ों से ही सीखी थीं।”

