31 अगस्त, सोमवार का दिन धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत फलदायी और पावन माना जा रहा है। भाद्रपद (भादो) मास का पहला सोमवार होने के साथ-साथ इस दिन कजरी तीज और बहुला चौथ का भी विशेष संयोग बना हुआ है। यद्यपि देवों के देव महादेव की आराधना किसी भी दिन की जा सकती है, परंतु सोमवार के दिन शिव साधना का (first monday of Bhado) विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित कर सुख-शांति व आरोग्य की कामना करते हैं।
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‘सोम’ का अर्थ चंद्रमा: ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं में (first monday of Bhado) सोमवार का दिन ‘सोम’ यानी चंद्रमा को समर्पित है, जो मन, शीतलता और भावनाओं के नियंत्रक ग्रह हैं।
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संकटमोचक बने महादेव: जब चंद्रदेव गंभीर संकट और श्राप से घिर गए थे, तब उन्होंने भगवान शिव की शरण ली थी। भोलेनाथ ने न केवल उनके कष्ट का निवारण किया, बल्कि उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर देवलोक में सर्वोच्च सम्मान भी प्रदान किया।
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मानसिक शांति और चंद्र दोष निवारण: मान्यता है कि सोमवार को शिवलिंग का जलाभिषेक करने से कुंडली के चंद्र दोष शांत होते हैं और मानसिक तनाव व चिंताओं से मुक्ति मिलती है।
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चंद्रदेव को क्यों मिला था क्षय रोग का भयंकर श्राप?
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दक्ष की 27 पुत्रियों से विवाह: पौराणिक मान्यता के अनुसार चंद्रदेव का विवाह राजा दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था, जो आकाशमंडल के 27 नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
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रोहिणी से अत्यधिक अनुराग: चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में रोहिणी से सबसे अधिक प्रेम करते थे और अधिकांश समय उन्हीं के साथ व्यतीत करते थे, जिससे अन्य पत्नियों में असंतोष फैल गया।
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दक्ष का श्राप: जब चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति की निष्पक्ष रहने की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया, तो क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें धीरे-धीरे क्षीण होने वाले ‘क्षय रोग’ (Tuberculosis/Wasting) का श्राप दे दिया, जिसके प्रभाव से चंद्रमा का तेज और कलाएं समाप्त होने लगीं।
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