नागपुर/नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था पर संघ का रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि पिछड़ों और वंचित वर्गों के लिए नौकरियों व शिक्षा में (big statement on reservation) आरक्षण की शुरुआत ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने हेतु की गई थी।
big statement on reservation – उन्होंने दोहराया कि जब तक समाज में यह असमानता और भेदभाव बना रहेगा, तब तक आरक्षण की व्यवस्था लागू रहेगी और रहनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने अपील की कि जो वर्ग या परिवार तरक्की कर चुके हैं और सक्षम हो गए हैं, उन्हें आगे मिलने वाले लाभों का त्याग करने पर विचार करना चाहिए ताकि समाज के अन्य वंचित लोगों को अवसर प्राप्त हो सकें। संघ प्रमुख ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया, जिससे समाज में परस्पर कड़वाहट उत्पन्न हुई।
‘टीवी डिबेट और चुनावी मंचों से कहीं अधिक जटिल है आरक्षण का प्रश्न
मोहन भागवत ने रेखांकित किया कि आरक्षण एक ऐसा गंभीर विषय है, जिसका सही या गलत तय करना उतना सरल नहीं है जितना यह टीवी डिबेट्स या चुनावी भाषणों में दिखाई देता है। अक्सर इस मुद्दे पर किसी की धारणा उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं, सामाजिक अनुभवों और ऐतिहासिक समझ पर आधारित होती है। यही कारण है कि यह भारतीय समाज और राजनीति का सबसे पेचीदा और संवेदनशील प्रश्न है। अधिकांश राजनीतिक दल इस पर खुली वैचारिक बहस से बचते हैं और इसे केवल चुनावी वोट बैंक के समीकरणों तक सीमित कर देते हैं। ।
आरक्षण पर वोट बैंक की राजनीति बंद हो
संघ प्रमुख ने चिंता व्यक्त की कि भारत में आरक्षण केवल सामाजिक नीति न रहकर सत्ता की राजनीति, जातीय गणित और चुनावी रणनीति का औजार बन गया है। उन्होंने ‘आरक्षण पर राजनीति’ और ‘आरक्षण की राजनीति’ के मध्य अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय पर स्वस्थ बहस आवश्यक है, किंतु यदि हर विषय को केवल वोट बैंक के चश्मे से देखा जाएगा, तो स्थायी समाधान असंभव हो जाएगा। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में ऐसी नीतियों पर आंकड़ों, तथ्यों और सामाजिक यथार्थ के धरातल पर निष्पक्ष संवाद होना चाहिए।


