छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राज्य में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को सही ढंग से लागू न करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है, जिस पर राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा संज्ञान लिए जाने पर उन्होंने आभार जताया है। यह मामला प्रदेश के 50 हजार से अधिक अनुसूचित जनजाति और वन निवासी परिवारों के जीवनयापन से जुड़ा है।
🌊 जलक्षेत्र और वन अधिकार अधिनियम
डॉ. महंत ने अधिनियम की धारा 3(1)(घ) का हवाला देते हुए कहा कि वन भूमि स्थित जलक्षेत्रों पर स्थानीय समुदायों का कानूनी अधिकार होना चाहिए। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि राज्य के हजारों परिवार मछली पालन और जल संसाधनों पर निर्भर हैं, लेकिन उन्हें सामुदायिक अधिकार पत्र (Community Rights) नहीं दिए जा रहे हैं।
🏗️ ठेकेदारी प्रथा बनाम आदिवासी अधिकार
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया है कि राज्य में लगभग 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र को वन अधिकार अधिनियम की भावना के विपरीत ठेकेदारों को पट्टे पर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा:
“राज्य सरकार की वर्तमान मछली नीति वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। बड़े जलाशयों को ठेका प्रणाली के माध्यम से संचालित किए जाने से स्थानीय समुदायों के हित प्रभावित हो रहे हैं और उन्हें कानून के तहत मिलने वाले अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं।”
⚖️ राष्ट्रपति से राज्यपाल और मुख्यमंत्री को निर्देश देने की गुहार
डॉ. महंत ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वे छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को आवश्यक निर्देश जारी करें ताकि अधिनियम का तत्काल क्रियान्वयन हो सके। राष्ट्रपति द्वारा मामले को संज्ञान में लेने के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि प्रशासन आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों के हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाएगा।
संपादकीय टिप्पणी: प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का अधिकार सुनिश्चित करना न केवल कानूनी आवश्यकता है, बल्कि यह आदिवासी समाज के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। क्या आपको लगता है कि वन अधिकार अधिनियम को पूर्णतः लागू करने से छत्तीसगढ़ के सुदूर क्षेत्रों में पलायन की समस्या कम हो सकती है? अपने विचार नीचे साझा करें।



