मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर उठ रही आशंकाओं के बीच एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है. क्या इसका असर भारत की बिजली व्यवस्था पर पड़ेगा? और अगर पड़ेगा तो कितना. आइए समझते हैं कि भारत की ऊर्जा व्यवस्था कितनी सुरक्षित है और आने वाली गर्मियों में बिजली की मांग को पूरा करने की (power crisis alert) सरकार की तैयारी क्या है. सबसे पहले बात करते हैं मध्य पूर्व के तनाव की.
मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आपूर्ति क्षेत्रों में से एक है. भारत अपनी गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है. भारत के लिए एलएनजी का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है क़तर एनर्जी, जो क़तर की सरकारी ऊर्जा कंपनी है. कतर एनर्जी ने क्षेत्रीय तनाव के बीच अपना प्लांट और प्रोडक्शन दोनों अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया है.
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भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है. या फिर एलएनजी की आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत के ऊर्जा क्षेत्र पर कुछ असर जरूर पड़ सकता है. लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत की बिजली व्यवस्था मुख्य रूप से गैस पर नहीं बल्कि कोयले पर आधारित है. भारत में कुल बिजली उत्पादन का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से आता है. गैस आधारित बिजली की हिस्सेदारी लगभग 5 से 7 प्रतिशत के आसपास है.
power crisis alert – भारत में कोयले का भंडार भी पर्याप्त है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 400 अरब टन से अधिक कोयले के संसाधन उपलब्ध हैं. यही कारण है कि ऊर्जा संकट की आशंका के समय सरकार अक्सर कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों को पूरी क्षमता से चलाने का निर्देश देती है. ईरान-इजराइल और अमेरिका युद्ध के दौरान सरकार ने सभी Gencos को कोयला आधारित बिजली उत्पादन को अधिकतम करने और पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं.


