सुप्रीम कोर्ट ने आज किराएदार और मालिक के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ किया कि एक किरायेदार, जो किसी संपत्ति में किरायेदारी के लिए रेंट डीड (किराया समझौता) पर दाखिल हुआ है, वह (decisive decision on ownership rights) बाद में मकान मालिक के मालिकाना हक को चुनौती नहीं दे सकता है. SC ने कहा कि ऐसा करना ‘डॉक्ट्राइन ऑफ एस्टॉपेल’ (रोक के सिद्धांत) के खिलाफ है.
decisive decision on ownership rights – अगर आसान तरीके से समझें, तो सोचिए, आप किसी के मकान में किराए पर रहने जाते हैं और रेंट डीड पर साइन करते हैं. इसका मतलब है कि आपने मान लिया कि जिस शख्स ने आपको मकान दिया है, वही उसका असली मालिक है. अब सालों बाद आप यह कहना शुरू नहीं कर सकते कि यह मकान उस व्यक्ति का है ही नहीं.
किरायेदार अब नहीं कर सकता मालिक होने का दावा- कोर्ट ने कहा कि जिस किरायेदार के परिजनों ने 50 साल से ज्यादा समय तक मूल मालिक को किराया दिया, वह अब उनके मालिकाना हक पर सवाल नहीं उठा सकता. एक ‘रिलिंक्विशमेंट डीड’ से भी मूल मालिक के हक की पुष्टि हुईॉ है.
मालिकाना हक का सबूत- कोर्ट ने फिर से साफ किया कि किरायेदार को बेदखल करने के मुकदमे में, मालिकाना हक के सबूत को उतनी सख्ती से नहीं देखा जाता, जितना कि मालिकाना हक के ऐलान के अलग मुकदमे में.
विल का महत्व- मकान मालिक (यानी वादी) के पक्ष में बाद में मिली ‘विल’ की प्रोबेट (अदालती मंजूरी) को कानूनी मान्यता मिल गई थी, जिसे हाई कोर्ट की ओर से नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था.
मालिक की जरूरत वाजिब- मकान मालिक की यह दलील मान ली गई कि उन्हें अपने पति के मिठाई और नमकीन के व्यवसाय में शामिल होने और उसका विस्तार करने के लिए खाली किए जाने वाले परिसर की वाजिब जरूरत है.

