महाभारत सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह धर्म और अधर्म के संघर्ष की गाथा भी है. इस महाग्रंथ में जहां भगवान श्रीकृष्ण को धर्म और नीति का प्रतीक माना जाता है, वहीं अक्सर शकुनि को सबसे बड़ा खलनायक बताया जाता है. लेकिन पौराणिक मान्यताओं और घटनाओं को ध्यान से देखें तो कई विद्वान मानते हैं कि (Mahabharata Mystery) महाभारत में भीष्म पितामह की भूमिका भी बेहद जटिल रही है. वे अधर्म के सीधे कर्ता तो नहीं थे, लेकिन कई मौकों पर उनकी चुप्पी ने अधर्म को बढ़ावा दिया.

प्रतिज्ञा का घातक बंधन भीष्म ने आजीवन हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा की शपथ ली थी. इसी प्रतिज्ञा के कारण वे दुर्योधन की गलतियों पर पर्दा डालते रहे. उन्होंने राष्ट्रहित से ऊपर अपनी निजी प्रतिज्ञा को रखा, जिसने आखिर में पूरे वंश का विनाश कर दिया.

द्रौपदी चीरहरण पर शर्मनाक चुप्पी यह महाभारत का वो काला अध्याय है जिसने भीष्म के चरित्र पर सबसे गहरा दाग लगाया. भरी सभा में जब द्रौपदी का अपमान हो रहा था, तब भीष्म जैसा प्रतापी योद्धा सिर झुकाए बैठे रहे. उनकी इस कार्य ने दुर्योधन के दुस्साहस को बढ़ाया था, जो महाभारत के विनाशकारी युद्ध का सबसे बड़ा कारण बना था.

Mahabharata Mystery – मन पांडवों के साथ, शस्त्र कौरवों के लिए भीष्म जानते थे कि पांडव सत्य के मार्ग पर हैं और कृष्ण उनके साथ हैं. इसके बावजूद उन्होंने कौरवों की सेना का नेतृत्व किया. उनकी यह दोहरी भूमिका ही उन्हें शकुनि और दुर्योधन के समकक्ष खड़ा करती है.

 

 

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